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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादान – संस्तरोपक्रमणानादर- स्मृत्यनुपस्थानानि ॥ ३४॥
Meaning
अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित उत्सर्ग, अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित आदान, अप्रत्यवेक्षित- अप्रमार्जित संस्तरोपक्रमण, अनादर और स्मृत्यनुपस्थान, ये पाँच प्रोषधोपवास व्रत के अतिचार हैं॥ ३४॥

भावार्थ

अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित उत्सर्ग ( जन्तु हैं या नहीं, यह बिना देखे और भूमि को कोमल कूंची वगैरह से बिना साफ किये जमीन पर मल मूत्र वगैरह करना), अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित आदान) बिना देखे और बिना शोधे पूजा की सामग्री और अपने पहिनने के वस्त्र वगैरह उठा लेना), अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित संस्तरोपक्रमण ( बिना देखी और बिना साफ की हुई भूमि पर चटाई वगैरह बिछाना), अनादर (उपवास के कारण भूख प्यास से पीड़ित होने से आवश्यक क्रियाओं में उत्साह न होना), स्मृत्यनुपस्थापन (आवश्यक क्रियाओं को भूल जाना), ये पाँच प्रोषधोपवास व्रत के अतिचार हैं || ३४ ॥Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

Performing these three activities, excreting – utsarga, taking of objects – ādāna, and spreading mats and garments – samstara, without inspecting and cleaning the place and the materials, lack of earnestness – anādara, and lack of concentration – smṛtyanupasthāna, are the five transgressions of the supplementary vow of fasting at regular intervals – proṣadhopavāsavrata.
Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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प्रोषधोपवास व्रत
graph TD

A["प्रोषधोपवास व्रत"]

A --> B["अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित (बिना देखे - बिना शोधे)"]
A --> C["अनादर"]
A --> D["स्मृति अनुपस्थान"]

B --> B1["उत्सर्ग<br/>* जमीन पर मल-मूत्र का त्याग करना"]
B --> B2["आदान<br/>* पूजा के उपकरण आदि व स्वयं के वस्त्रादि ले लेना"]
B --> B3["संस्तर<br/>* भूमि पर आसनादि बिछाना"]

C --> C1[" उत्साह रहित आवश्यक कार्य करना"]

D --> D1[" आवश्यक धर्म कार्य करना भूल जाना"]

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer प्रोषधोपवास व्रत के पाँच अतिचार हैं- (१) अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्ग (२) अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितादान (३) अप्रत्यवेक्षिता-प्रमार्जित संस्तरोपक्रमण (४) अनादर (५) स्मृत्यनुपस्थान
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer अदृष्टमृष्टग्रहण (आदान) अतिचार उसके होता है जो भूख से पीड़ित होकर अर्हन्त आदि की पूजा के उपकरण तथा अपने वस्त्र आदि को बिना देखे और बिना शोधे ग्रहण करता है ।अदृष्टमृष्ट विसर्ग (उत्सर्ग) अतिचार उसके होता है जो भूख से पीड़ित होने के कारण बिना देखी, बिना शोधी भूमि में मलमूत्र छोड़ता है । अदृष्टमृष्ट संस्तरण अतिचार उसके होता है जो भूख से पीड़ित होने के कारण बिना देखे, बिना शोधे स्थान पर बिस्तर आदि बिछाता है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 5-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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