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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
आनयन-प्रेष्यप्रयोग-शब्द-रूपानुपात – पुद्गलक्षेपाः ॥ ३१ ॥
Meaning
आनयन, प्रेष्यप्रयोग, शब्दानुपात, रूपानुपात और पुद्गलक्षेप ये देशव्रत के अतिचार हैं ॥ ३१ ॥

भावार्थ

आनयन (अपने संकल्पित देश में रहते हुए मर्यादा से बाहर के क्षेत्र की वस्तु को किसी के द्वारा मंगाना), प्रेष्य प्रयोग ( मर्यादा से बाहर के क्षेत्र में किसी को भेजकर काम करा लेना), शब्दानुपात ( मर्यादा से बाहर के क्षेत्र में काम करने वाले पुरुषों को लक्ष्य करके खाँसना वगैरह, जिससे वे आवाज सुनकर जल्दी-जल्दी काम करें), रूपानुपात (मर्यादा के बाहर काम करने वाले पुरुषों को अपना रूप दिखाकर काम कराना), पुद्गलक्षेप ( मर्यादा के बाहर पत्थर वगैरह फेंककर अपना काम करा लेना) ये पाँच देशविरति व्रत के अतिचार हैं ॥ ३१ ॥Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

Sending for something outside the country of one’s resolve – anayana, commanding someone there to do thus -presyaprayoga, indicating one’s intentions by sounds – sabdānupāta, by showing oneself – rūpānupāta, and by throwing clod, etc. – pudgalakṣepa, are the five transgressions of the supplementary vow of abstaining from activity with regard to the country – deśavirativrata. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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देशव्रति
graph TD

A["देशव्रति"]

A --> B["आनयन"]
A --> C["प्रेष्यप्रयोग"]
A --> D["शब्दानुपात"]
A --> E["रूपानुपात"]
A --> F["पुद्गलक्षेप"]

D --> G["मर्यादित क्षेत्र से बाहर"]

G --> H["की वस्तु मँगाना व किसी को बुलाना"]
G --> I["दूसरे व्यक्ति को काम बताना"]
G --> J["दूसरे को खाँसी आदि इशारों से अपना अभिप्राय बताना"]
G --> K["अपना रूप दिखा कार्य करवाना"]
G --> L["कंकर आदि पुद्गल फेंक कर अपना कार्य करवाना"]

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer जो पुरुष किसी उद्योग में जुटे हैं उन्हें उद्देश्य कर खाँसना आदि शब्दानुपात है । मर्यादा के बाहर कार्य करने वाले नौकरों का उद्देश्य लेकर खड़े होकर खाँसी या अन्य प्रकार से शब्द करके नौकरों से कार्य कराना शब्दानुपात है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer स्वयं मर्यादित क्षेत्र के भीतर स्थित रहकर बाह्य क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को अपना शरीर दिखलाना रूपाभिव्यक्ति नाम का अतिचार है । मेरे रूप को (मुझे) देखकर ये ‘शीघ्र ही कार्य करेंगे’ इस अभिप्राय से अपने शरीर को दिखाना रूपानुपात है, ऐसा निर्णय किया जाता है। जो पुरुष किसी उद्योग में जुटे हैं उन्हें अपना शरीर दिखाना रूपानुपात है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 5-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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