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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्व्यतिक्रम क्षेत्रवृद्धि – स्मृत्यन्तराधानानि ॥ ३० ॥
Meaning
ऊर्ध्वातिक्रम, अधोऽतिक्रम, तिर्यगतिक्रम, क्षेत्रवृद्धि और स्मृत्यन्तराधान पाँच दिग्विरति व्रत के अतिचार हैं॥ ३० ॥

भावार्थ

दिशाओं की परिमित मर्यादा के लांघने को अतिक्रम कहते हैं। संक्षेप से उसके तीन भेद हैं- पर्वत या बहुमंजिले मकान वगैरह पर चढ़ने से ऊर्ध्वातिक्रम अतिचार होता है। कुएँ वगैरह में उतरने से अधोऽतिक्रम होता है और पर्वत की गुफा वगैरह में चले जाने से तिर्यगतिक्रम होता है। दिशाओं का जो परिमाण किया है, लोभ आकर उससे अधिक क्षेत्र में जाने की इच्छा करना क्षेत्रवृद्धि नाम का अतिचार है। हुई मर्यादा को भूल जाना स्मृत्यन्तराधान है ॥ ३० ॥Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

Transgressing (vyatikrama) the limits set in the directions, namely, upward (ūrdhva), downwards (adhaḥ), and transverse (tiryag), enlarging boundaries in the accepted directions – kṣetravṛddhi, and forgetting the boundaries set – smṛtyantarādhāna, are the five transgressions of the supplementary vow of abstaining from activity with regard to the direction –digvirativrata. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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दिग्व्रति
graph TD

A["दिग्व्रति"]

A --> B["व्यतिक्रम (मर्यादा का उल्लंघन)"]
A --> C["क्षेत्रवृद्धि"]
A --> D["स्मृत्यन्तरधान"]

B --> B1["ऊर्ध्व<br/>* ऊपर"]
B --> B2["अधो<br/>* नीचे"]
B --> B3["तिर्यंग<br/>* 4 दिशा व 4 विदिशा"]

C --> C1[" मर्यादा की हुई दिशा के बढ़ाने का अभिप्राय रखना"]

D --> D1[" मर्यादा को याद नहीं रखना"]

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer पूर्व दिशा में योजन आदि के द्वारा मर्यादा करके पुनः लोभ कषाय के कारण उस मर्यादा से अधिक दिशा की इच्छा करना क्षेत्रवृद्धि है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer परिग्रह परिमाण व्रत में इनका अन्तर्भाव नहीं हो सकता है क्योंकि उसका अधिकरण भिन्न है और इनका अधिकरण भिन्न है । परिग्रह परिमाण व्रत में क्षेत्र, वास्तु आदि दस प्रकार के बाह्य परिग्रहों का परिमाण किया जाता है । परन्तु दिग्व्रत में दिशाओं में जाने की मर्यादा की जाती है। इस प्रकार दोनों का विषय भिन्न-भिन्न है। यद्यपि इस दिशा में लाभ होगा तो मेरा जीवन है, नहीं होगा तो मरण है, तथापि दूसरी दिशा में लाभ होने पर भी गमन नही करूंगा । स्वीकृत मर्यादा से आगे लाभ होने पर भी गमन नहीं करना दिग्विरति है। दिशाओं में क्षेत्र, वास्तु आदि के समान परिग्रह बुद्धि से आत्मसात् करके परिमाण नहीं किया जाता, अत: इसका अर्थ विशेष जानना चाहिए ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 5-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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