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Acharya Shri Umaswati
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मार्गाच्यवन-निर्जरार्थं परिषोढव्याः परीषहाः ॥८॥
सूत्रार्थ– मार्ग में च्युत न होने के लिए और कर्मों की निर्जरा करने के लिए जो सहन करने योग्य हों, वे परीषह हैं ।।८।।


भावार्थ

अर्थ : संवर के मार्ग से च्युत न होने के लिए तथा कर्मों की निर्जरा के लिए परिषहों को सहना चाहिए। अर्थात् जो स्वेच्छा से भूख प्यास वगैरह की परिषह को सहते हैं। उनके ऊपर अब कोई उपसर्ग आता है तो कष्ट सहन करने का अभ्यास होने से वे उन उपसर्गों से घबराकर अपने मार्ग से डिगते नहीं हैं। और इनके सहन करने से कर्मों की निर्जरा भी होती है। अतः विपत्ति के समय मन को स्थिर रखने के लिए परिषहों को सहना भी उचित है ॥८॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

Those which are endured so as not to swerve from the path and for the sake of dissociation (nirjara) of karmas are the afflictions (parisaha).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: परीषहजय यह सार्थक नाम है। क्योंकि नाम छोटे से छोटा रखा जाता है। यहाँ ‘परीषह ‘ इतना बड़ा नाम रखने का यह प्रयोजन है कि ‘परीषहजय’ यह सार्थक नाम है अतः इसका जैसा नाम है वैसा ही कहा जाता है कि जो सहन किये जायें वे परीषह हैं।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर : कर्मागम द्वार को रोकने वाले संवर रूप जिनेन्द्रकथित मार्ग से च्युत न हो जायें, इसके पूर्व ही परीषहों पर विजय प्राप्त की जाती है, वा कर्मों की निर्जरा के लिए जो सहन की जावे, वह परीषह- जय कहलाती है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 9-Mar-2026

Courtesy:
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