
Acharya Shri Umaswati
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–
Sutra
तपसा निर्जरा च ॥३॥
Meaning
(तपसा) तप से (निर्जरा) निर्जरा भी होती है (च) और संवर भी होता है॥३॥


भावार्थ
यद्यपि दस धर्मों में तप आ जाता है। फिर भी तप का अलग से ग्रहण यह बतलाने के लिये किया है कि तप से नवीन कर्मों का आना रुकता है और पहले बंधे हुए कर्मों की निर्जरा भी होती है तथा तप संवर का प्रधान कारण है। यद्यपि तप को सांसारिक अभ्युदय में भी कारण बतलाया है किन्तु तप का प्रधान फल तो कर्मों का क्षय होना है और गौण फल सांसारिक अभ्युदय की प्राप्ति होना है। जैसे खेती का प्रधान फल तो धान उत्पन्न होना है और गौण फल पलाल ( प्याल) वगैरह उत्पन्न होना है।Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
English Meaning:
By austerity (tapa), dissociation (nirjară) also is achieved. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain

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संवर के कारण
flowchart TB
A["संवर के कारण"]
A --> B["निश्चय से"]
A --> C["व्यवहार से"]
B --> B1["निजात्मा में लीनता रूप वीतराग भाव"]
C --> G1["गुप्ति<br/>स्वरूप निवृत्ति<br/>(संसार के कारणों से आत्मा की रक्षा करना)<br/><br/>भेद: 3"]
C --> G2["समिति<br/>यत्नाचार रूप प्रवृत्ति<br/><br/>भेद: 5"]
C --> G3["धर्म<br/>उत्तम स्थान में धैर्य<br/><br/>भेद: 10"]
C --> G4["अनुप्रेक्षा<br/>शारीरिक के स्वभाव का बार-बार चिंतन<br/><br/>भेद: 12"]
C --> G5["परीषहजय<br/>भूख आदि वेदना को संक्लेशता रहित सहना<br/><br/>भेद: 22"]
C --> G6["चारित्र<br/>संसार परिभ्रमण के कारण रूप क्रिया का अभाव<br/><br/>भेद: 5"]
C --> G7["तप<br/>इच्छाओं का रुकना<br/><br/>भेद: 12"]निर्जरा
flowchart TB
A["निर्जरा"]
A --> B["द्रव्य"]
A --> C["भाव"]
B --> B1["बँधे कर्मों का एकदेश खिरना (नाश होना)"]
C --> B2["जीव के परिणाम जिनसे कर्म खिरते हैं"]
निर्जरा का कारण
flowchart TB
A["निर्जरा का कारण"]
B["तप"]
C["शुद्ध आत्मस्वरूप में प्रतपन अर्थात् विजय करना"]
A --> B
B --> CQuestions and Answers: शङ्का -समाधान
Answer तपोनिधियों ने ऐसी शारीरिक क्रिया और मानसिक क्रिया को तप कहा है, जो अन्तरङ्ग व बहिरङ्ग मल के सन्ताप से सन्तप्त आत्मा की शुद्धि में कारण है। ख्याति, पूजा, लाभ आदि की भावना को त्याग कर मुनीश्वरों के द्वारा कर्मों के क्षय के लिए जो तपा जाता है उसे तप कहते हैं अथवा रत्नत्रय की प्राप्ति के लिए इच्छा को रोकने का नाम तप है । अथवा परद्रव्यों की अभिलाषा को दूर करना तप है अथवा शरीर और इन्द्रियों का दमन करने के लिए साधु के द्वारा जो तपा जाता है वह तप है। अथवा – जिसके द्वारा कर्म रूपी ईंधन को जलाकर भस्म किया जाता है वह तप है। मन और इन्द्रियों के नियन्त्रित करने वाले अनुष्ठान को तप कहते हैं। तपश्चरण करने वाले मुनि अपने तपश्चरण की सिद्धि के लिए जो अपनी इच्छानुसार इन्द्रिय सुखों का निरोध करते हैं उसको श्रेष्ठ तप कहते हैं।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
Answer संवर-निमित्तों का समुच्चय करने के लिए सूत्र में ‘च’ शब्द का ग्रहण किया है। ‘च’ शब्द तप, संवर का भी कारण होता है। इस संवर हेतुता का समुच्चय करता है, क्योंकि तप के द्वारा नूतन कर्म बन्ध रुककर पूर्वोपार्जित कर्मों का क्षय भी होता है । अतः तप अविपाक निर्जरा का कारण है। इस प्रकार तप के जातीयत्व होने से ध्यानों (धर्म्य व शुक्ल) के भी निर्जरा का कारणत्व प्रसिद्ध ही है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 9-Mar-2026
Courtesy:
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