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Acharya Shri Umaswati
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दानलाभभोगोपभोगवीर्याणाम् ॥१३॥
सूत्रार्थ– दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य- इनके पाँच अन्तराय हैं ॥१३॥




भावार्थ

अर्थ : दानान्तराय, लाभान्तराय, भोगान्तराय, उपभोगान्तराय और वीर्यान्तराय ये पाँच भेद अन्तराय कर्म के हैं। जिसके उदय से देने की इच्छा होते हुए भी नहीं देता है वह दानान्तराय है। लाभ की इच्छा होते हुए भी तथा प्रयत्न करने पर भी जिसके उदय से लाभ नहीं होता है वह लाभान्तराय है। भोग और उपभोग की चाह होते हुए भी जिसके उदय से भोग उपभोग नहीं कर सकता वह भोगान्तराय और उपभोगान्तराय है। उत्साह करने पर भी जिसके उदय से उत्साह नहीं हो पाता वह वीर्यान्तराय है ॥१३॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

The obstructive (antarāya) karma has five subdivisions: the antarāya karma of obstructing the making of a gift (charity) – dāna antarāya, the attainment of a gain – lābha antarāya, enjoyment of consumable things – bhoga antarāya, enjoyment of non-consumable things – upabhoga antarāya, and effort (energy) – vīrya antarāya.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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अंतराय
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    A["अंतराय"] --> B["दानान्तराय<br>देने की इच्छा करता हुआ भी नहीं देता"] & C["लाभान्तराय<br>प्राप्ति की इच्छा रखता हुआ भी लाभ नहीं प्राप्त करता"] & D["भोगान्तराय<br>भोगने की इच्छा करता हुआ भी भोग नहीं सकता"] & E["उपभोगान्तराय<br>उपभोगने की इच्छा करता हुआ भी उपभोग नहीं सकता"] & F["वीर्यान्तराय<br>शक्ति प्रकट करने की इच्छा होते हुए भी उत्साह नहीं कर सकता"]

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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: यद्यपि भोग और उपभोग दोनों सुखानुभव में निमित्त हैं तथापि एक बार भोगने में आने वाली गन्ध, माला, स्नान, वस्त्र, अन्न, पानादि वस्तुओं में भोग का उपदेश होता है और शय्या, आसन, स्त्री, हाथी, घोड़ा, रथ आदि बार-बार भोगने में आने वाली वस्तुओं में उपभोग उपदेश होता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर : जो प्राणी दूसरों के दान देने और पाने में बाधक होते हैं वे भव-भव में दरिद्र ही होते हैं। जो किसी को होते हुए लाभ में अकारण ही अड़ंगा लगा देते हैं उनकी सम्पत्ति कमाने की इच्छा असफल ही रहती है। अपने-अपने पुण्य के फलस्वरूप भोगों का रस लेने वालों के मार्ग में जो बाधक होते हैं वे स्वयं भी सब ही भोगों से वंचित रह जाते हैं। जिन्होंने दूसरों के उपभोग भोगने के मार्ग में रोड़े अटकाये हैं वे सम्पत्ति आदि साधनों को पाकर भी उपभोग के आनन्द से वंचित ही रह जाते हैं। दूसरों की शक्ति वीर्य के विकास मार्ग में जो काँटे बोते हैं वे भी इस संसार में शक्तिहीन और अक्षम होते हैं।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 8-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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