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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
गति – स्थित्युपग्रहौ धर्माधर्मयोरुपकारः ॥१७॥
Meaning
स्वयं चलते हुये जीव और पुद्गल को चलने में सहायता देना धर्मद्रव्य का तथा स्वयं ठहरते हुये जीव और पुद्गल को ठहरने में सहायता देना अधर्मद्रव्य का उपकार या काम है॥१७॥

भावार्थ

जो जीव और पुद्गलों को चलने में सहायक होता है उसे धर्मद्रव्य तथा जो ठहरने में सहायक होता है उसे अधर्म द्रव्य कहते हैं। Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

The functions of the medium of motion (dharma) and the medium of rest (adharma) are to assist motion and rest, respectively. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


धर्म और अधर्म द्रव्य का उपकार
जीव पुद्गल के गमन व स्थिति में –
1. उत्पादनजीव पुद्गल स्वयं
2. अंतरंग निमित्तक्रियावती शक्ति
3. बहिरंग निमित्त1. साधारण कारण (उदासीन-अप्रेरक) धर्म और अधर्म द्रव्य
2. विशेष कारण – जल, पटरी, छाया आदि

अधर्म द्रव्य – गतिपूर्वक स्थिति रूप परिणमे द्रव्यों की स्थिति में सहायक, स्थित द्रव्यों को नहीं


Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer : द्रव्य के देशान्तर की प्राप्ति का हेतु परिणाम गति है । बाह्य और आभ्यन्तर कारणों से परिणमन करने वाले द्रव्यों को देशान्तर में प्राप्त कराने वाली पर्याय गति कहलाती है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer जिस प्रकार सिद्ध भगवान अमूर्त होने पर भी निष्क्रिय और अप्रेरक होने पर भी ‘मैं सिद्ध समान अनन्त ज्ञानादि स्वरूप हूँ’ इत्यादि व्यवहार से सविकल्प सिद्ध-भक्ति-युक्त ऐसे जीवों को सिद्धगति के सहकारी कारण हैं, उसी प्रकार निष्क्रिय, अमूर्त और अप्रेरक होने पर भी धर्मद्रव्य अपने उपादान कारण से गति करते हुए जीव और पुद्गलों को गति में सहकारी कारण है- जैसे मछली आदि को जल आदि के गमन में सहायक होने के लोकप्रसिद्ध दृष्टान्त की भाँति ; ऐसा अभिप्राय है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 12-feb-2026

Courtesy:
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