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Acharya Shri Umaswati
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स आस्त्रवः ।।२।।
सुत्रार्थ- वही आस्त्रव है ।।२।।




भावार्थ

अर्थ: यह योग ही आस्त्रव है। अर्थात् सरोवर में जिस द्वार से पानी आता है वह द्वार पानी के आने में कारण होने से आस्रव कहा जाता है। वैसे ही योग के निमित्त से आत्मा में कर्मों का आगमन होता है इसलिए योग ही आस्त्रव है। आस्त्रव का अर्थ ‘आगमन’ है। ॥२॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

The activity of the body, the speech, and the mind – the ‘yoga’ – is the influx (āsrava).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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आस्रव का स्वरूप (कर्मों का आना)

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    A["आस्रव का स्वरूप<br>(कर्मों का आना)"] --> B["उपादान<br>भाव योग"] & C["कार्य<br>द्रव्य योग"] & D["निमित्त<br>मन, वचन, काय<br>की चेष्टा"] & E["फल<br>द्रव्य आस्रव -<br>कर्मों का आना"]

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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: जिस प्रकार तालाब के जलागमन द्वार से पानी आता है वह जलागमन द्वार जल आने का कारण होने से आस्रव कहलाता है, उसी प्रकार योग प्राणाली से आत्मा में कर्म आते हैं अतः योग को ही आस्रव कहते हैं। संक्षेप से आस्रव का ज्ञान कराने के लिए योग को आस्रव कहा है, क्योंकि इन तीन योगों में ही विषयकषाय होने से आस्रव होता है। अतः विषयकषाय से अनुबन्धित ही उपयुक्त योग एवं अविवेक योग से ही कर्मबंधन का कारण सिद्ध हो जाता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर: यद्यपि केवलिसमुद्घात अवस्था में सूक्ष्म योग मात्नकर तन्निमित्तक अल्प बंध माना जाता है, परन्तु एक सुत्र बनाने से तो केवलिसमुद्घात में साधारण योगात्व और बहुबंध का प्रसंग आने से विपरीतता आती है। वस्तुतः तो वर्गाना-निमित्तक आत्मप्रदेश परिस्पंद रूप मुख्य योग ही आस्रव कहा जाता है, परंतु केवलिसमुद्घात अवस्था में होने वाले दण्ड, कपाट, प्रतर और लोकपूरण योग वर्गाना अवलंबन रूप नही है, इससे आस्रव नहीं होता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 27 February 2026.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project


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