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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
भेद – सङ्घाताभ्यां चाक्षुषः ॥ २८ ॥
Meaning
(चाक्षुषः) चक्षु इन्द्रिय से दिखने योग्य स्कन्ध (भेदसंघाताभ्याम्) भेद और संघात दोनों से ही (उत्पद्यते) उत्पन्न होता है। केवल भेद से उत्पन्न नहीं हो सकता ॥ २८ ॥

भावार्थ

आशय यह है कि अनन्त परमाणुओं का स्कन्ध होने से ही कोई स्कन्ध चक्षु इंद्रिय के द्वारा देखने योग्य नहीं हो जाता । किन्तु उनमें भी कोई दिखाई देने योग्य होता है और कोई दिखाई देने योग्य नहीं होता। ऐसी स्थिति में यह प्रश्न पैदा होता है कि जो स्कन्ध अदृश्य है वह दृश्य कैसे हो सकता है। तो उसके समाधान के लिए यह सूत्र कहा गया है, जो बतलाता है कि केवल भेद से ही कोई स्कन्ध चक्षु इंद्रिय से देखने योग्य नहीं हो जाता किन्तु भेद और संघात दोनों से ही होता है। जैसे एक सूक्ष्म स्कन्ध है। वह टूट जाता है। टूटने से उसके दो टुकड़े हो जाने पर भी वह सूक्ष्म ही बना रहता है और इस तरह वह चक्षु इंद्रिय के द्वारा नहीं देखा जा सकता । किन्तु जब वह सूक्ष्म स्कन्ध दूसरे स्कन्ध में मिलकर अपने सूक्ष्मपने को छोड़ देता है और स्थूल रूप धारण कर लेता है तो चक्षु इंद्रिय का विषय हो जाता है उसे आँख से देखा जा सकता है॥ २८ ॥Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

The molecules (skandha) produced by the combined action of fission (bheda) and fusion ( sanghāta) can be perceived by the eyes. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


स्कन्धादि की उत्पत्ति के कारण
flowchart TB

A["स्कन्धादि की उत्पत्ति के कारण"]

A --> B["स्कन्ध"]
A --> C["परमाणु"]
A --> D["चाक्षुष स्कन्ध (वह स्कन्ध जो चक्षु से दिखे)"]

B --> B1[" भेद (अलग होना)"]
B --> B2[" संघात (मिलना)"]
B --> B3[" भेद-संघात (दोनों एक साथ)"]

C --> C1["भेद से ही"]

D --> D1["भेद-संघात से ही"]

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer  संघात से ही स्कन्धों की उत्पत्ति की सिद्धि हो जाने पर भेद – संघात का ग्रहण करना निष्प्रयोजन है, ऐसा कहने पर भेदसंघात के ग्रहण के प्रयोजन का प्रतिपादन करने के लिए यह सूत्र कहा गया है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer सूक्ष्म परिणत स्कन्ध से कुछ अंश का भेद होने पर भी सूक्ष्मता का परित्याग नहीं करने से वह स्कन्ध अचाक्षुष ही रहता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 12-feb-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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