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Acharya Shri Umaswati
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असंख्येय भागादिषु जीवानाम् ।।१५।।
सूत्रार्थ – लोकाकाश के असंख्यातवें भाग आदि में जीवों का अवगाह है ।।१५।।


भावार्थ

अर्थ : लोक के असंख्यातवें भाग आदि में जीवों का अवगाह होता है। अर्थात् लोकाकाश के असंख्यात भाग करने पर जो एक असंख्यातवाँ भाग होता है कम से कम उस एक असंख्यातवें भाग में एक जीव रहता है क्योंकि सबसे जघन्य अवगाहना सूक्ष्म निगोदिया जीव की होती है। सो वह जीव लोक के असंख्यातवें भाग स्थान को रोकता है। यदि जीव की अवगाहना बड़ी होती है तो वह लोक के दो, तीन, चार आदि असंख्यातवें भागों में रहता है। यहाँ तक कि सर्वलोक तक में व्याप्त हो जाता है।
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

The souls (jiva) inhabit one of innumerable (asamkhyata) parts, etc., of the universe-space (lokakasa).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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लोक में अवगाह
जीवपुद्गलधर्मअधर्मआकाशकाल
एक द्रव्य
* लोक का असंख्यवाँ भाग
* लोक का असंख्यवाँ बहुभाग एवं सर्व लोक
(सिर्फ केवली समुद्घात में)
* एक प्रदेश (अणु और सूक्ष्म स्कंध)
* संख्यात प्रदेश
* असंख्यात प्रदेश
समस्त लोक
(तिल में तेल जैसे)
समस्त लोक
(तिल में तेल जैसे)
एक प्रदेश
(रत्ती की राशि जैसे)
सर्व द्रव्य
सर्व लोक
(लोकाकाश)
सर्व लोकसर्व लोकसर्व लोकसर्व लोक

संख्यामान
flowchart TB
    A["संख्यामान"] --> B["संख्यात"] & C["असंख्यात"] & D["अनंत"]
    B --> B1["मति-श्रुत ज्ञानी जिसे जान सके"]
    C --> C1["अवधिज्ञानी जिसे जान पाए परंतु मति-श्रुत ज्ञानी जिसे न जान सके"]
    D --> D1["मात्र केवलज्ञानी जिसे जान पाए"]

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    style C fill:#FFCDD2
    style D fill:#C8E6C9
    style B1 fill:#BBDEFB
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Video Pravachans

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: जीव ‘दो प्रकार के होते हैं- सूक्ष्म और बादर । जिनका शरीर स्थूल होता है उन्हें बादर कहते हैं। बादर जीव एक जगह बहुत से नहीं रह सकते। किंतु सूक्ष्म शरीर वाले जीव सूक्ष्म होने से जितनी जगह में एक निगोदिया जीव रहता है। उतनी जगह में साधारण काय के रूप में अनंतानंत रह सकते हैं; क्योंकि वे न तो किसी से रुकते हैं और न किसी को रोकते हैं। अतः कोई विरोध नहीं होता।
Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

उत्तर : लोकाकाश का प्रकरण होने से लोकाकाश का सम्बन्ध लगा लेना चाहिए। ‘लोकाकाशेऽवगाह:’ इस सूत्र से लोक के असंख्यातवें भाग में जीव रहता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 12-feb-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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