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Acharya Shri Umaswati
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अविग्रहा जीवस्य ।।२७।।
सूत्रार्थ- मुक्त जीव की गति विग्रहरहित होती है ।।२७।।

भावार्थ

अर्थ- मुक्त जीव की गति मोड़े रहित होती है। अर्थात् मुक्त जीव श्रेणी के अनुसार ऊपर गमन करके एक समय में ही सिद्ध क्षेत्र में जाकर ठहर जाता है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

English Meaning:

The movement of the liberated (mukta) soul is without a bend – avigraha.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: मुक्त जीवों की गति में वक्रता (कुटिलता) के निमित्त कारणों का अभाव होने से ऊर्ध्वगमन स्वभाव होने से मुक्तात्माओं की अविग्रहा गति ही होती है। उर्ध्वलोक के ठीक मध्य में पैतालीस लाख योजन विस्तार वाला मनुष्य क्षेत्र सिद्धलोक के सात राजु नीचे स्थित है। कर्मभूमि में तपस्या स्थानों के अतिरिक्त सभी समुद्र, पर्वत, भोगभूमि आदि स्थलों से संहरण की अपेक्षा जीवों का गमन होता है। मनुष्यक्षेत्र के जिस स्थान से जीव मुक्त होते हैं ठीक उसी स्थान से सात राजु ऊपर तनुवातवलय में स्थित सिद्धलोक में ठहर जाते हैं अतः मोड़ा लेने की आवश्यकता नहीं है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

उत्तर: आगे के सूत्र अठाईस में ‘संसारिणः’ पद के ग्रहण से जाना जाता है कि इस सूत्र में मुक्त जीवों का ग्रहण किया गया है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on – 5 February 2026.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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