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Acharya Shri Umaswati
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संज्ञिनः समनस्काः ।।२४।।
सूत्रार्थ – मनवाले जीव संज्ञी होते हैं ।।२४।।


भावार्थ

अर्थ– मन सहित जीवों को संज्ञी कहते हैं। अतः मन रहित जीव असंज्ञी कहलाते हैं। एकेन्द्रिय, दोइन्द्रिय, तेइन्द्रिय और चोइन्द्रिय जीव तो सब असंज्ञी ही होते हैं। पंचेन्द्रियों में देव, नारकी और मनुष्य संज्ञी होते हैं किंतु तिर्यंच मन रहित भी होते हैं।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

English Meaning:

The five-sensed beings with the mind (mana) are called ‘samjñī’.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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संज्ञा शब्द के अनेक अर्थ

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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: सयोग केवली भगवान संज्ञी नहीं हैं क्योंकि आवरण कर्म से रहित उनके मन के अवलम्बन से बाह्य अर्थ का ग्रहण नहीं पाया जाता है, सयोग केवली भगवान असंज्ञी भी नहीं हैं क्योंकि जिन्होंने समस्त पदार्थों को साक्षात् कर लिया है, उन्हें असंज्ञी मानने में विरोध है। केवली भगवान विकलेन्द्रियों के समान मन की अपेक्षा बिना ही पदार्थों को ग्रहण करते हैं इसलिए भी उन्हें असंज्ञी नहीं कह सकते हैं क्योंकि यदि मन की अपेक्षा न करके ज्ञान की उत्पत्ति मात्र का आश्रय करके जानोत्पति की कारण होती तो ऐसा होता (केवली असंज्ञी होते) परन्तु ऐसा तो है नहीं, क्योंकि कदाचित् मन के अभाव से विकलेन्द्रिय जीवों की तरह केवली के बुद्धि के अतिशय का अभाव भी कहा जायेगा। इसलिए केवली विकलेन्द्रियों के समान मन की अपेक्षा के बिना बाह्य पदार्थों को ग्रहण करते हैं फिर भी वे असंज्ञी नहीं हैं।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

उत्तर: एकेन्द्रिय आदि असंज्ञी जीवों के सामान्य स्मृति ज्ञान का अभाव नहीं है। अनादि संसार परम्परा में प्राप्त हुए विषयों के अनुभव से उत्पन्न हुई सामान्य धारणा रूप हेतु का सद्भाव असंज्ञी जीवों के मन के बिना भी आहारादि में प्रवृत्ति देखी जाती है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on – 5 February 2026.

Courtesy:
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