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Acharya Shri Umaswami
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रूपिष्ववधेः॥२७॥
सूत्रार्थ – अवधिज्ञान की प्रवृत्ति रूपी पदार्थों में होती है॥२७॥

भावार्थ

अवधिज्ञान के विषय का नियम रूपी पदार्थों में है। यहाँ पूर्व सूत्र से ‘असर्वपर्यायेषु’ पद ले लेना चाहिए। तथा ‘रूपी’ शब्द से पुद्गल द्रव्य लेना चाहिए, क्योंकि एक पुद्गल द्रव्य ही वास्तव में रूपी है। अतः अवधिज्ञान पुद्गल द्रव्य की कुछ पर्यायों को जानता है। इतना विशेष है कि पुद्गल द्रव्य से संबद्ध जीव द्रव्य की भी कुछ पर्यायों को जानता है, क्योंकि संसारी जीव कर्मों से बंधा होने से मूर्तिक जैसा ही हो रहा है। किन्तु मुक्त जीव को तथा अन्य अमूर्तिक द्रव्यों को अवधिज्ञान नहीं जानता। वह तो अपने योग्य सूक्ष्म अथवा स्थूल पुद्गल द्रव्य की त्रिकालवर्ती कुछ पर्यायों को ही जानता है।
Ref: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning

Right faith (samyagdarśana), right knowledge (samyagjñāna), and right conduct (samyakcārita), together, constitute the path to liberation – mokÈamārga. The word ‘samyak’ means ‘right’ or ‘laudable’. It should be prefixed to each of these three words: faith (darśana), knowledge (jñāna), and conduct (cāritra).
Ref: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: नहीं, असर्वपर्याय विशेषण का सम्बन्ध लगाने से सर्व पर्याय को जानने की निवृत्ति हो जाती है। इस सूत्र में उपरी कथित ‘असर्वपर्याययेषु’ की अनुवृत्ती कर लेनी चाहिए। जैसे – ‘जिनदत्त के लिए कम्बल और देवदत्त के लिए गाय दो’, इसमे ‘दो’ इस शब्द की अनुवृत्ती जिनदत्त और देवदत्त दोनों के लिए होती है उसी प्रकार इस सूत्र में ‘असर्वपर्याय’ की अनुवृत्ती कर लेनी चाहिए।

उत्तर : अविधिज्ञान स्त्री द्रव्यों के कुछ पर्यायों को और जीव के औदयिक, औपशमिक, क्षयोपशमिक भावों को जानता है। क्योंकि इनमें रूपी कर्म का सम्बन्ध है तथा रुपी कर्म के सम्बन्ध का अभाव होने से क्षायिक भव्य, परिणामिक भाव तथा धर्मादि द्रव्यों को अविधिज्ञान विषय नहीं करता, अविधिज्ञान इनको नहीं जानता है।



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 18-Dec-2025.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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