
Acharya Shri Umaswati
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भरतैरावतविदेहाः कर्मभूमयोऽन्यत्र देवकुरूत्तरकुरुभ्यः ॥३७॥
सूत्रार्थ – देवकुरु और उत्तरकुरु के सिवा भरत, ऐरावत और विदेह – ये सब कर्मभूमियाँ हैं ।।३७।।
भावार्थ
अर्थ: पाँचों मेरु सम्बन्धी पाँच भरत, पाँच ऐरावत और देवकुरु उत्तरकुरु को छोड़कर पांच विदेह। इस तरह अढ़ाई द्वीप में कुल पन्द्रह कर्म भूमियाँ हैं। कर्मभूमि जहाँ पर असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, विद्या, और शिल्प इन छह कर्मों द्वारा आजीविका की जाती है या जहाँ बड़े से बड़ा पापकर्म तथा बड़े से बड़ा पुण्यकर्म अर्जित किया जाता है उसे कर्मभूमि कहते हैं। पहले ढाई द्वीप में पैंतीस क्षेत्र और छ्यानवे अन्तद्वीप बतला आये हैं, उनमें से पाँच भरत, पाँच ऐरावत और पाँच विदेह ये पन्द्रह क्षेत्र ही कर्मभूमियाँ हैं। इनके सिवा सब क्षेत्र और अन्तद्वीप अकर्मभूमि अर्थात् भोगभूमि हैं। देवकुरु और उत्तरकुरु-ये विदेह क्षेत्र के अन्तर्गत हैं। इसीलिये विदेहों में कर्मभूमि की व्यवस्था बतलाने पर इनमें भी वह प्राप्त होती हैं, किन्तु पाँच देवकुरु और पाँच उत्तरकुरु इन दस क्षेत्रों में कर्मभूमि की व्यवस्था नहीं है, इसलिये प्रस्तुत सूत्र में इन दस भूमियों को कर्मभूमियों से पृथक् बतलाया है ।
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf
English Meaning:
Bharata, Airavata, and Videha, excluding Devakuru and Uttarakuru, are the regions of labour- karmabhumi.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain

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जम्बूद्वीप में कर्मभूमि एवं भोग भूमि
| जम्बूद्वीप में कर्मभूमि एवं भोग भूमि | |
|---|---|
| 15 कर्म-भूमियाँ | जहाँ असि, मसि, कृषि आदि कार्य हो पाँच भरत – 5 पाँच ऐरावत – 5 पाँच विदेह – 5 कुल – 15 |
| 30 भोग-भूमियाँ | जहाँ 10 प्रकार के कल्पवृक्षों से भोग-सामग्री प्राप्त हो जघन्य भोगभूमि – हैमवत एवं हैरण्यवत : 2 × 5 = 10 मध्यम भोगभूमि – हरि एवं रम्यक : 2 × 5 = 10 उत्कृष्ट भोगभूमि – देवकुरु एवं उत्तरकुरु : 2 × 5 = 10 कुल = 30 |
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Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: उत्तर ढाई द्वीप में पन्द्रह कर्मभूमियाँ होती हैं- पाँच भरतक्षेत्र में, पाँच ऐरावतक्षेत्र में और पाँच विदेहक्षेत्र में ।
Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष–Link to book
उत्तर : उत्तर ढाई द्वीप में तीस भोगभूमियाँ होती हैं- पाँच हेमवत क्षेत्र की, पाँच हरि क्षेत्र की, पाँच रम्यक क्षेत्र की, पाँच हैरण्यवत क्षेत्र की, पाँच देवकुरु और पाँच उत्तरकुरु जो कि विदेह क्षेत्र के अन्तर्गत हैं इस प्रकार कुल तीस भोगभूमियाँ होती हैं।
Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष–Link to book
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
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Diksha Jain created this page on 8-feb-2026
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