
Acharya Shri Umaswati
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Sutra
ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिताः ॥ २८ ॥
Meaning
भरत ऐरावतक्षेत्र के सिवाय अन्य भूमियों में (उत्सर्पिणी अवसर्पिणी) परिवर्तन नहीं होता है। वे सदा एक सी रहती हैं॥ २८ ॥

भावार्थ
हेमवत और हैरण्यवत क्षेत्र में तीसरा काल, हरि और रम्यक क्षेत्र में द्वितीय काल, देवकुरु और उत्तरकुरु (विदेह के अन्तर्गत) क्षेत्र में प्रथम सदैव चलता है । Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
English Meaning:
The regions other than these are stable. The regions other than Bharata and Airavata have stable states or conditions. In those regions there are no ascending or descending half- cycles of time. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
अवस्थित कर्मों के काल
| क्षेत्र का नाम | काल |
|---|---|
| देवकुरु–उत्तरकुरु | प्रथम काल – उत्तम भोगभूमि |
| हरि–वरष | दूसरा काल – मध्यम भोगभूमि |
| हेमवत–हरिवर्ष | तीसरा काल – जघन्य भोगभूमि |
| विदेह | चौथे काल के आदि से |
| कुम्भाण्ड गिरि–अविदेह | तीसरा काल तुल्य |
| मणुगिरि तथा स्वयम्भू पर्वत तक असंख्यात द्वीप एवं समुद्र | तीसरा काल तुल्य |
| अंत में असंख्यात द्वीप, स्वयम्भू समुद्र एवं चार कोने | पंचम काल तुल्य |
| देव गति | प्रथम काल तुल्य |
| नरक गति | छठा काल तुल्य |
भरत एवं ऐरावत के पाँचों खंड एवं विदेहखण्ड की श्रेणियाँ
चौथे काल के आदि से लगाकर उसी के अंत तक हानि–वृद्धि
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
Answer ढाई द्वीप में कुल तीस भोगभूमियाँ हैं। जम्बूद्वीप में ६ भोगभूमियाँ हैं-(१) हैमवत क्षेत्र (२) हैरण्यवत क्षेत्र ( जघन्य भोगभूमि) (३) हरिक्षेत्र (४) रम्यक क्षेत्र मध्यम भोगभूमि (५) देवकुरु क्षेत्र (६) उत्तरकुरु क्षेत्र – उत्तम भोगभूमि ।धातकी खण्ड की बारह भोगभूमियाँ हैं। दो हैमवत एवं दो हैरण्यवत, दो हरि, दो रम्यक, दो देवकुरु एवं दो उत्तरकुरु। इसी प्रकार बारह पुष्करार्ध द्वीप में भी जाननी चाहिए। ३.इस प्रकार कुलमिलाकर ६+१२+१२=३० भोगभूमियाँ हैं।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Answer वहाँ की भूमि सुसज्जित सुन्दर स्त्री के समान आकर्षक लगती है। महामहेन्द्र नील, मणियों से, रुचकप्रभ रत्नों से, कर्कतनों द्वारा अत्यन्त जगमगाते हुए सूर्यकान्त मणियों द्वारा तथा चन्द्रकान्त मणियों से पूरी हुई पृथ्वी सब ऋतुओं और सब ही बेलाओं में अत्यधिक शोभित होती है। किसी स्थान पर भूमि का रंग बन्धूक पुष्प या मनःशिला के समान लाल है। दूसरे स्थलों की छटा जाति पुष्प, अंजन और सोने के रंग की है। अन्य स्थलों की कांति सारङ्ग ( बगुला ) पक्षियों के पंखों के समान है तथा कुछ अन्य स्थलों की छवि चन्द्रमा के अंकुरों के समान मोहक धवल है। (व.चा. ७ / ४-६ ) वहाँ की भूमि पंच वर्ण वाली और हीरा, इन्द्रनील, मरकत, मुक्ताफल, पद्मरागमणि तथा स्फटिक मणि से संयुक्त तन, मन, नयनों को आनंद देती है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
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Diksha Jain created this page on 6-feb-2026
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