Table of Contents

Acharya Shri Umaswati
Read About Acharya Umaswami
here


भरतैरावतयोर्वृद्धिह्रासौ षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम् ।।२७ ।।
सूत्रार्थ– भरत ऐरावत क्षेत्र में उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी के छह-छह कालों में मनुष्यों की आयु की वृद्धि और ह्रास होता है ।।२७ ।।


भावार्थ

 अर्थ : भरत और ऐरावत क्षेत्र में उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल के छह समयों के द्वारा मनुष्यों की आयु, शरीर की ऊँचाई, भोगोपभोग, संपदा वगैरह घटती और बढ़ती रहती है। उत्सर्पिणी में दिनों दिन बढ़ती है, अवसर्पिणी में दिनोंदिन घटती है।
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

In Bharata and Airāvata there is rise (regeneration) and fall (degeneration) during the six periods of the two aeons of regeneration and degeneration.
Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Video Pravachans

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: यहाँ पर शंकाकार कहता है कि इन पूर्वोक्त भरतादि क्षेत्रों में मनुष्यों का अनुभव आदि क्या समान है या कुछ विशेषता है ? इस शंका का समाधान करने के लिए यह सूत्र कहा गया है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

उत्तर: भरत और ऐरावत का वृद्धि -हास होता है।’ यद्यपि क्षेत्र तो हमेशा अवस्थित रहता है उसका वृद्धि-हास नहीं हो सकता फिर भी तात्स्थ्य होने से शब्द की सिद्धि होती है। अत: भरत- ऐरावत में वृद्धि -हास का योग होता है। इस लोक में आधार-आधेय मान लेते हैं। जैसे पर्वत स्थित वनस्पति के जलने पर पर्वत जल रहा है, ऐसा कहा जाता है; उसी प्रकार भरत ऐरावत में रहने वाले मनुष्यों की आयु आदि की वृद्धि-ह्रास होने पर भरत – ऐरावत का वृद्धि -हास कह दिया जाता है। अथवा “भरतैरावतयोः” इसमें अधिकरण (सप्तमी ) निर्देश है। वह अधिकरण होने से आधेय की आकांक्षा करता है। अत: भरत-ऐरावत में मनुष्यों का वृद्धि-हास होता है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 6-feb-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



All Chapters