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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
भरतैरावतयोर्वृद्धिह्रासौ षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम् ।।२७ ।।
Meaning
भरत ऐरावत क्षेत्र में उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी के छह-छह कालों में मनुष्यों की आयु की वृद्धि और ह्रास होता है।।२७ ।।

भावार्थ

 बीस कोड़ाकोड़ी सागर का एक कल्पकाल होता है। उसके दो भेद हैं। उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी प्रत्येक काल के छह-छह भेद होते हैं। उत्सर्पिणी – जिसमें जीवों की आयु आदि की वृद्धि होती है। अवसर्पिणी- जिसमें जीवों की आयु का हास होता है।उत्सर्पिणी काल के छह भेद दुष्षम दुष्षमा, दुष्षमा, दुष्षम सुषमा, सुषम दु सुषमा और सुषम सुषमा ।अवसर्पिणी के छह भेद सुषमसुषमा, सुषमा, सुषमदुःषमा, दुःषमसुषमा, दुःषमा और अतिदुःषमा । सुषमसुषमा चार कोड़ाकोड़ी सागर का सुषमा तीन कोड़ाकोड़ी सागर का, सुषमदुः षमा- दो कोड़ाकोडी सागर का, दुःषमसुषमा व्यालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागर वर्ष का, दुःषमा इक्कीस हजार वर्ष का, अतिदुःषमा इक्कीस हजार वर्ष का होता है। कि प्रत उत्सर्पिणी के प्रथम, द्वितीय और तृतीय काल में तथा अवसर्पिणी के चतुर्थ, पंचम और षष्ठ काल में कर्मभूमि रहती है। शेष काल में भोगभूमि रहती है। Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष Link to book

English Meaning:

In Bharata and Airāvata there is rise (regeneration) and fall (degeneration) during the six periods of the two aeons of regeneration and degeneration. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain



Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer यहाँ पर शंकाकार कहता है कि इन पूर्वोक्त भरतादि क्षेत्रों में मनुष्यों का अनुभव आदि क्या समान है या कुछ विशेषता है ? इस शंका का समाधान करने के लिए यह सूत्र कहा गया है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

Answer भरत और ऐरावत का वृद्धि -हास होता है ।’ यद्यपि क्षेत्र तो हमेशा अवस्थित रहता है उसका वृद्धि-हास नहीं हो सकता फिर भी तात्स्थ्य होने से शब्द की सिद्धि होती है। अत: भरत – ऐरावत में वृद्धि -हास का योग होता है। इस लोक में आधार-आधेय मान लेते हैं। जैसे पर्वत स्थित वनस्पति के जलने पर पर्वत जल रहा है, ऐसा कहा जाता है; उसी प्रकार भरत ऐरावत में रहने वाले मनुष्यों की आयु आदि की वृद्धि-ह्रास होने पर भरत – ऐरावत का वृद्धि -हास कह दिया जाता है। अथवा “भरतैरावतयोः” इसमें अधिकरण (सप्तमी ) निर्देश है। वह अधिकरण होने से आधेय की आकांक्षा करता है। अत: भरत-ऐरावत में मनुष्यों का वृद्धि-हास होता है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 6-feb-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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