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Acharya Shri Umaswati
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अनुश्रेणी गति: ।।२६।।
सूत्रार्थ- गति श्रेणी के अनुसार होती है ।।२६।।

भावार्थ

अर्थ- लोक के मध्य से लेकर ऊपर, नीचे और तिर्यक दिशा में आकाश के प्रदेशों की सीधी कतार को श्रेणी कहते हैं। जीवों और पुद्गलों की गति आकाश के प्रदेशों की पंक्ति के अन्तराल से होती है। पंक्ति को लांघकर विदेशाओं में गमन नहीं होता।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

English Meaning:

The transit in space takes place in straight lines (śrenī).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: संसारी जीव एक भव से दूसरे भव में जाते समय छः प्रकार से गमन करता है (१) ऊपर से नीचे की ओर (२) नीचे से ऊपर की ओर (३) पूर्व से पश्चिम की ओर (४) पश्चिम से पूर्व की ओर (५) उत्तर से दक्षिण की ओर (६) दक्षिण से उत्तर की ओर।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

उत्तर: आकाशप्रदेश पंक्ति को श्रेणी कहते हैं। लोक के मध्य से लेकर ऊपर, नीचे और तिरछे क्रमशः सन्निविष्ट आकाशप्रदेशों की पंक्ति को श्रेणी कहते हैं। उस श्रेणी के अनुसार ही गमन होता है। अनु शब्द की आनुपूर्वी में वृत्ति होती है, श्रेणी की आनुपूर्वी अनुश्रेणी कहलाती है। वस्त्र, तनु के समान अथवा चर्म के अवयव के समान अनुक्रम से ऊपर, नीचे और तिरछे रूप से व्यवस्थित आकाशप्रदेशों की पंक्तियाँ श्रेणियाँ कहलाती हैं।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on – 5 February 2026.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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