
Acharya Shri Umaswati
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विग्रहगतौ कर्मयोगः ।।२५।।
सूत्रार्थ- विग्रहगति में कार्मण काययोग होता है ।।२५।।

भावार्थ
अर्थ- ‘विग्रह’ शब्द के दो अर्थ हैं। विग्रह अर्थात् शरीर; शरीर के लिए गमन करने को विग्रह गति कहते हैं। अथवा विरुद्ध ग्रहण करने को विग्रह कहते हैं। इसका आशय यह है कि संसारी जीव हमेशा कर्म और नोकर्म को ग्रहण करता रहता है किंतु विग्रह गति में पुद्गलों का तो ग्रहण होता है, नोकर्म पुद्गलों का ग्रहण नहीं होता है। इसलिए उसको विरुद्ध ग्रहण कहा और विरुद्ध ग्रहण पूर्वक जो गमन होता है उसे विग्रह गति कहते हैं तथा कार्मण शरीर को कर्म कहते हैं। उस कार्मण शरीर के द्वारा जो आत्मा के प्रदेशों में कम्पन होता है उसको कर्मयोग कहते हैं। अतः सूत्र का अर्थ हुआ- विग्रह गति में कर्मयोग होता है। उस कर्मयोग के द्वारा ही जीव नवीन कर्मों को ग्रहण करता है तथा मृत्यू स्थान से अपने जन्म लेने के नए स्थान तक जाता है ।।२५।।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
English Meaning:
In transit from one body to another – vigrahagati – there is the vibration of the karmic-body – kārmana śarīra.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: विग्रहगति को प्राप्त चारों गतियों के जीवों के तथा प्रतर और लोकपूर्ण समुद्घात को प्राप्त केवली जिन के कार्मणकाययोग होता है। कार्मण काययोग एकेन्द्रिय जीवों से लेकर सयोगकेवली तक होता है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
उत्तर: शरीरों की उत्पत्ति का मूल कारण कार्मण शरीर है उसे कर्म कहते हैं तथा वचन वर्गणा, मनोवर्गणा और कायवर्गणा के निमित्त से होने वाला आत्मप्रदेशों का परिस्पन्दन योग है। कर्म के निमित्त से जो योग होता है वह कर्मयोग है। कार्मण शरीर के निमित्त से जो योग होता है वह कार्मण काय योग है। अन्य औदारिकादि शरीर-वर्गणाओं के बिना केवल एक कर्म से उत्पन्न हुए वीर्य के निमित्त से जो योग होता है वह कार्मण काययोग है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
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Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on – 5 February 2026.
Courtesy:
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