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Acharya Shri Umaswati
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निर्वृत्त्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम्।।१७।।
सूत्रार्थ- निर्वृत्ति और उपकरणरूप द्रव्येन्द्रिय है ।।१७।।

भावार्थ

अर्थ: निर्वृत्ति और उपकरण को द्रव्येन्द्रिय कहते हैं। कर्म के द्वारा होने वाली रचना विशेष को निर्वृत्ति कहते हैं। निर्वृत्ति दो प्रकार की होती है- आभ्यन्तर निर्वृत्ति और बाह्य निर्वृत्ति। उत्सेधान्गुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण विशुद्ध आत्म प्रदेशों की इन्द्रियों के आकार रचना होने को आभ्यन्तर निर्वृत्ति कहते हैं। तथा उन आत्म प्रदेशों के प्रतिनियत स्थान में पुद्गलों की इन्द्रिय के आकार रचना होने को बाह्य निर्वृत्ति कहते हैं। निर्वृत्ति का उपकार करने वाले पुद्गलों को उपकरण कहते हैं। उपकरण के भी दो भेद होते हैं- आभ्यन्तर और बाह्य। जैसे नेत्रो में जो काला और सफेद मण्डल है वह आभ्यन्तर उपकरण है और पलक वगैरह बाह्य उपकरण है।।१७।।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

English Meaning:

The physical-sense (dravendriya) consists of the formation of the organ – nirvrtti – and the instrument itself – upakarana.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: चक्षु आदि में मूसर आदि के आकार रूप बाह्य निर्वृत्ति है। इन्द्रिय नामवाले उन्हीं आत्मप्रदेशों में प्रतिनियत आकार रूप और नामकर्म के उदय से विशेष अवस्था को प्राप्त जो पुद्गल प्रवच होता है उसे बाह्य निर्वृत्ति कहते हैं। आत्मा के उन्हीं (जहाँ आभ्यन्तर निर्वृत्ति है) विशुद्ध प्रदेशों में इन्द्रियों के नाम से कहे जाने वाले भिन्न-भिन्न आकारों के धारक संस्थान नामकर्म के उदय से होने वाली अवस्था विशेष से युक्त जो पुद्गल पिण्ड है वह बाह्य निर्वृत्ति है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

उत्तर: निर्वृत्ति दो प्रकार की होती है। (१) बाह्य निर्वृत्ति (२) आभ्यन्तर निर्वृत्ति।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on – 4 February 2026.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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