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Acharya Shri Umaswati
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द्विन्द्रियादयस्त्रसाः।।१४।।
सूत्रार्थ- दो इन्द्रिय आदि त्रस हैं ।।१४।।

भावार्थ

अर्थ: दो इन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चौइन्द्रिय और पंचेन्द्रिय जीवों को त्रस कहते हैं। दो इन्द्रिय जीव के छह प्राण होते हैं- स्पर्शन और रसना ये दो इन्द्रियाँ, काय बल, वचन बल, आयु और श्वासोच्छ्वास। तेइन्द्रिय के एक घ्राणेन्द्रिय के बढ़ जाने से सात प्राण होते हैं। चौइन्द्रिय के एक चक्षु इन्द्रिय के बढ़ जाने से आठ प्राण होते हैं। पंचेन्द्रिय असैनी के एक श्रोत्र इन्द्रिय के बढ़ जाने से नौ प्राण होते हैं और सेनी पंचेन्द्रिय के मनोबल के बढ़ जाने से दस प्राण होते हैं ।।१४।।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

English Meaning:

The trasa beings are those having two or more senses (indriya).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: हाँ, लोक में घोड़ा, हाथी, वक़, भ्रमर, शालभ, मत्कुण, उद्देद्विका, गोभि और इन्द्रगोप आदि रूप से जितने कर्मों के फल पाये जाते हैं, उतने ही प्रकार के कर्म होते हैं।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

उत्तर: विकलत्रय इस ओर मनुष्योत्तर पर्वत तक ही रहते हैं अर्थात् ढाई द्वीप में रहते हैं। उस ओर स्वयंभ्रमण द्वीप के अर्ध भाग से लेकर अन्त तक पाये जाते हैं। भोगभूमि में विकलत्रय जीव नहीं होते हैं। विकलत्रय जीव नियम से कर्मभूमि में ही होते हैं तथा अन्त के अर्ध द्वीप में और अन्त के सारे समुद्र में होते हैं।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on – 4 February 2026.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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