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Acharya Shri Umaswami
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तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यदर्शनम्॥२॥
सूत्रार्थ – अपने-अपने स्वरूप के अनुसार पदार्थों का जो श्रद्धान होता है,वह सम्यदर्शन है॥२॥


भावार्थ

जीव आदि तत्त्वों के स्वरूप का निश्चय तत्त्वार्थ है और तत्त्वार्थ  का श्रद्धान सम्यग्दर्शन है।
Ref: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष

English Meaning:

The faith in substances according to their true nature is called Right Faith.
Ref: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Graphical representation

सम्यग्दर्शन

तत्त्व + अर्थ + श्रद्धान

भाव + भाववान् (पदार्थ) + प्रतीति


Questions and Answers: शङ्का -समाधान

उत्तर : तत्व – जो पदार्थ जिस रूप में स्थित है उसका उसी रूप में होना तत्व है। अर्थ – ‘अर्यते, निश्चीयते इत्यर्थः’। ‘तत्वेन अर्थेः तत्वार्थः’। तत्व और अर्थ इन दोनों शब्दों के संयोग से तत्वार्थ शब्द बना है। अथवा भाव द्वारा भाववाले पदार्थ का कथन किया जाता है क्योंकी भाव भाववाले से अलग नहीं पाया जाता है। अतः “तत्वमेवार्थस्तत्त्वार्थः”। तत्व के द्वारा जिसका निश्चय किया जाता है वह तत्वार्थ है। जो जाना जाता है, ज्ञान का विषय है, उसको अर्थ कहते है और तत्व से जिसका निर्णय हो उसे तत्वार्थ कहते हैं। जो पदार्थ जिस रूप से व्यवस्थित है उसको उसी रूप में ग्रहण करना तत्वार्थ है।

Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

उत्तर : संसार से भय होना, शान्त परिणाम होना, धीरता रखना, मूढताओं का त्याग करना, गर्व नहीं करना, श्रद्धा रखना और दया करना सम्यग्दर्शन की ये सात भावनाएँ जानने योग्य हैं। परिणामों की स्थिरता रखना, जिनायतनादि धर्मक्षेत्र में रमण करना, उत्तम भावनाएँ भाना, शंकादि दोषों से रहित होना सम्यग्दर्शन को शुद्ध रखने के उपाय हैं।



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 12-Dec-2025.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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