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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
द्विर्द्विर्विष्कम्भाः पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणो वलयाकृतयः।।८।।
Meaning
वे सभी द्वीप और समुद्र दूने दूने व्यासवाले, पूर्व-पूर्व द्वीप और समुद्र को वेष्टित करनेवाले और चूड़ी के आकार वाले हैं ।

भावार्थ

 प्रत्येक द्वीप समुद्र (द्विः द्विः) दूने दूने (विष्कम्भाः) विस्तार वाले (पूर्व-पूर्व) पहिले पहिले के द्वीप समुद्र को (परिक्षेपिणः) घेरे तथा (बलयाकृतयः) चूड़ी के समान आकार वाले (सन्ति) हैं।द्वीप से समुद्र का और समुद्र से द्वीप का विस्तार दुगुना है तथा द्वीप से द्वीप का और समुद्र से समुद्र का विस्तार चौगुना है। इस प्रकार तीसरे द्वीप का विस्तार १६ लाख योजन और तीसरे समुद्र का विस्तार ३२ लाख योजन है। Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष Link to book

English Meaning:

Each island and ocean is twice as wide as the previous one. They surround (encircle) the earlier islands and oceans and are shaped like circular rings (like bangles).The width from island to ocean and from ocean to island is doubled, and the width from island to island and from ocean to ocean becomes four times.In this way, the width of the third island is 16 lakh yojanas, and the width of the third ocean is 32 lakh yojanas.Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष Link to book



Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer ‘द्विर्द्वि:’ यह वीप्सा में समासान्त वचन विष्कम्भ के द्विगुणित को बताने के लिए है। जैसे – प्रथम जम्बूद्वीप का जो विष्कम्भ है उससे द्विगुणित लवण समुद्र है। उससे दूना धातकी खण्ड है, उससे दूना दूसरा (कालोदधि) समुद्र है। इस प्रकार एक दूसरे से दूने विस्तार की व्याप्ति के लिए ‘द्विर्द्धि:’ ऐसा वीप्सार्थक निर्देश किया है । द्वीप- समुद्रों का विस्तार दूना – दूना है इस बात को दिखाने के लिए सूत्र में ‘द्विर्द्वि:’ इस प्रकार वीप्सा अर्थ में अभ्यावृत्ति वचन है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

Answer  अनिष्ट विनिवेश की व्यावृत्ति के लिए ‘पूर्व – पूर्व परिक्षेपिणः’ वचन दिया है। इन द्वीपों और समुद्रों का ग्राम, नगर आदि के समान अनिष्ट ज्ञान न हो अर्थात् ग्रामादि के समान अक्रम से नहीं हैं किन्तु पूर्व-पूर्व को घेरे हुए हैं। इसलिए सूत्र में ‘पूर्व – पूर्वपरिक्षेपिण:’ पद कहा गया है। इससे उत्तरोत्तर अन्तर नहीं है । एक दूसरे से सटे हुए हैं। यह सिद्ध होता है। पूर्व – पूर्व परिक्षेपणशील होने से यहाँ पर ‘पूर्व-पूर्व परिक्षेपिण:’ ऐसा ग्रहण किया है। यहाँ पर स्पष्ट ज्ञान कराने के लिए द्वित्व कहा है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



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Diksha Jain created this page on 5- feb-2026

Courtesy:
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