
Acharya Shri Umaswati
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Sutra
तेष्वेक-त्रि-सप्त-दश- सप्तदश-द्वाविंशति-त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा
सत्त्वानां परा स्थितिः ॥६॥
Meaning
(तेषु) नरकों में (सत्त्वानाम् ) नारकी जीवों की (परा स्थिति:) उत्कृष्ट आयु क्रम से (एकसागरोपमा) एक सागर, (त्रिसागरोपमा ) तीन सागर, (सप्तसागरोपमा) सात सागर, (दशसागरोपमा) दस सागर, (सप्तदशसागरोपमा) सत्रह सागर, ( द्वाविंशतिसागरोपमा) वाईस सागर, और ( त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा ) तेतीस सागर है।

भावार्थ
उन नरकों में नारकियों की उत्कृष्ट स्थिति क्रमशः एक सागर, तीन सागर, सात सागर,दस सागर, सत्रह सागर, बाईस सागर और तैंतीस सागर प्रमाण है। Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
English Meaning:
In those hells, the maximum lifespan of the hell-beings is respectively: one Sāgara, three Sāgaras, seven Sāgaras, ten Sāgaras, seventeen Sāgaras, twenty-two Sāgaras, and thirty-three Sāgaras. Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
सात नरक
| सात नरक | भाव लेश्या | शरीर की ऊँचाई (उत्कृष्ट) | उत्कृष्ट आयु | लगातार उसी नरक में उत्पत्ति | किस नरक से निकलकर नरक में उत्पत्ति | किस जीव को वहाँ जाने की शक्ति है |
|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रथम नरक | जघन्य कापोत | 7 अंगुल, 3 हाथ, 6 अंगुल | 1 | 8 बार | — | असंनी पंचेन्द्रिय |
| द्वितीय नरक | मध्यम कापोत | 15 अंगुल, 2 हाथ, 12 अंगुल | 3 | 7 बार | — | गौ, सरीसृप |
| तृतीय नरक | उत्कृष्ट कापोत, जघन्य नील | 31 अंगुल, 1 हाथ | 7 | 6 बार | — | पक्षी |
| चतुर्थ नरक | मध्यम नील | 62 अंगुल, 2 हाथ | 10 | 5 बार | तीर्थंकर | सर्प |
| पंचम नरक | उत्कृष्ट नील, जघन्य कृष्ण | 125 अंगुल | 17 | 4 बार | नरम शरीरी | सिंह |
| षष्ठ नरक | मध्यम कृष्ण | 250 अंगुल | 22 | 3 बार | भावलिंगी मुनि | स्त्री |
| सप्तम नरक | उत्कृष्ट कृष्ण | 500 अंगुल | 33 | 2 बार | 2-5 गुण-स्थानवर्ती | पुरुष, मत्स्य |
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
Answer नरकों में नारकी जीव उपपाद स्थान से छत्तीस प्रकार के शस्त्रों के ऊपर गिरते हैं और गिरते ही गेंद की तरह उछलते हैं और पुन: उसी स्थान पर गिरते हैं।
Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
Answer प्रथम नरक के नारकी जीव सात उत्सेध योजन और छ: हजार, पाँच सौ धनुष उछलते हैं। उससे आगे के नरकों के नारकी जीव दूना दूना उछलते हैं।
Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
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Diksha Jain created this page on 3-feb-2026
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