Table of Contents

Acharya Shri Umaswati
Read About Acharya Umaswami
here


Sutra
परस्परोदीरित- दुःखाः ॥४॥
Meaning
अर्थ- नारकी जीव (परस्परोदीरितः दुःखाः) आपस में एक दूसरे को दुःख देते हैं और वे कुत्तों की तरह परस्पर में एक दूसरे कुत्ते के समान लड़ते हैं।

भावार्थ

नरकों में भयानक दुःख और चीर फाड़ होने पर भी असमय में मृत्यु नहीं होती। क्योंकि वहाँ अकाल मरण नहीं होता है।
Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष Link to book

English Meaning:

Even though there is terrible suffering and severe injury in hells, untimely death does not occur. Because premature death does not happen there.

Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष Link to book

क्रम विवरण
1 मनुष्य गति
2 तिर्यंच गति
3 कर्मभूमिजन संज्ञी पर्याप्त गर्भज ही होता है।
4 सातवें नरक

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer: अम्बाबरीष देव, पहले दूसरे तथा तीसरे नरक तक के जीवों को दुःख उत्पन्न कराते हैं।
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूषLink to book

नारकियों में निर्दयता होने से कुत्ते के समान एक नारकी के दूसरे नारकी को देखने सेक्रोध की उत्पत्ति हो जाती है। (२) रौद्रध्यान से नरक में उत्पन्न होने के कारण तथा अंतरंग कारण स्वयं के उपार्जित क्रोधादि कर्मों के उदय से युक्त क्रोधी नारकियों में परस्पर दुःख उभार (उदीरितकर) दिया जाता है। जैसे उत्साह सहित ललकारने पर कुपित मेढ़ा, मुर्गी, दुष्टजन आदि के द्वारा परस्पर दुःख उदीरित कर दिया जाता है ।

Reference link:Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on – 31-01-26

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



All Sutras Chapter1


    All Chapters