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Acharya Shri Umaswami
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जीवाजीवास्रवबंधसंवरनिर्जरामोक्षस्तत्त्वम्।।४।।
सूत्रार्थ – जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये तत्त्व हैं।।४।।

भावार्थ

(जीवाजीवास्रवबन्धसंवरनिर्जरामोक्षा:) जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, सवंर, निर्जरा और मोक्ष ये सात (तत्त्वम्) तत्त्व (सन्ति) हैं।
Ref: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष

English Meaning:

The soul – jīva, the non-soul – ajīva, influx – āsrava, bondage – bandha, stoppage – samvara, gradual dissociation – nirjarā, and liberation – moksa, constitute the reality (tattva).
Ref: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Graphical representation
flowchart TB
    T["सात तत्व"] --> J["जीव"]
    J --> A["अजीव"]
    A --> AS["आस्रव"]
    AS --> B["बन्ध"] & AS1["द्रव्य : कर्मों का आना"] & AS2["भाव : शुभ–अशुभ भावों की उत्पत्ति"]
    B --> S["संवर"] & B1["द्रव्य : कर्मों का आत्मा से सम्बन्ध"] & B2["भाव : शुभ–अशुभ भावों का बने रहना"]
    S --> N["निर्जरा"] & S1["द्रव्य : कर्मों का आना रुकना"] & S2["भाव : शुभ भावों की उत्पत्ति"]
    N --> M["मोक्ष"] & N1["द्रव्य : कर्मों का एकदेश खिरना"] & N2["भाव : शुभ भावों की वृद्धि"]
    M --> M1["द्रव्य : कर्मों का सम्पूर्ण नाश"] & M2["भाव : शुभ भावों की पूर्णता"]

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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

उत्तर : तत्वार्थ श्रद्धान को सम्यग्दर्शन कहा हैं, अतः वे तत्व कौन-कौन से हैं ऐसा प्रश्न होने पर यह सूत्र कहा गया है।

Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

उत्तर : त्रैकालिक जीवन का अनुभव करने वाला होने से जीव है। पाँच इन्द्रिय, मनोबल, वचनबल, कायबल, आयु और श्वासोच्छवास, इन दस प्राणों में से अपनी-अपनी पर्यायानुसार ग्रुहित प्राणों के द्वारा तीनों कालों में जीवन का अनुभव करने वाला होने से ‘जीता है, जीता था और जीवेगा’ इसलिये यह जीव है। शुद्ध निश्चय नय से यद्यपि जीव शुद्ध चैतन्य लक्षण निश्चय प्राणों से जीता है  तथापि व्यवहार नय से कर्मोदयजनित द्रव्य व भाव प्राणों से जीता है। चेतना स्वभाव होने से चेतना के विकल्प रूप ज्ञान-दर्शन लक्षण वाला जीव है। इस चेतना से ही जीव अन्य द्रव्यों से व्यावृत होता है। जिसके सन्निधान से आत्मा ज्ञाता-द्रष्टा, कर्ता, भोक्ता होता है वह जीव का लक्षण है। आत्मा का लक्षण चेतना तथा उपलब्धि है और वह उपलब्धि ज्ञान-दर्शन लक्षण वाली है।



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 12-Dec-2025.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project


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