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Acharya Shri Umaswami
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भावप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्।।२१।।
सूत्रार्थ – भावप्रत्यय अवधिज्ञान देव और नारकीयों के होता है।।२१।।

भावार्थ

अनिन्द्रिय अर्थात मन और श्रुत अर्थात श्रुत ज्ञान का विषयभूत पदार्थ। श्रुतज्ञान का विषयभूत पदार्थ मन का विषय है। अर्थात श्रुत ज्ञानावरण कर्म का क्षयोपशम होने पर मन की सहायता से ही आत्मा श्रुतज्ञान के विषय को जानता है। अतः श्रुतज्ञान का होना मन का प्रमुख काम है। अपने इस काम में वह किसी इन्द्रिय की सहायता नहीं लेता।
Ref: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning

Clairvoyance based on birth – bhavapratyaya avadhijñāna – is possessed by the celestial and the infernal beings.
Ref: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान : ऐसा नहीं है क्योंकि यहाँ सम्यग्दर्शन का अधिकार है। ‘सम्यग्दर्शन – सम्यग्ज्ञान’ इस सुत्र की अनुवृत्ति है इसलिए उनका सम्बन्ध है अतः सम्यग्दृष्टियों के अवधिज्ञान होता हैं और मिथ्यादृष्टियों के विभांगावधि होती है, ऐसा जानना चाहिए। अथवा — आगे कहे जाने वाले सूत्र ‘मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च’ का सम्बन्ध होने से भी सभी देव-नारकीयों को अवधिज्ञान का प्रसंग नहीं आता। अथवा — आगे कहे जाने वाले सूत्र ३१ से विशेष प्रतिपत्ति होती है।

उत्तर : भव प्रत्यय अवधिज्ञान देव, नारकीयों एवं तीर्थंकरों के पाया जाता है। (यद्यपि तीर्थंकरकोई भव नहीं है तथापि तीर्थंकर नरक या स्वर्ग से आकर ही उत्पन्न होते है। नरक व स्वर्ग में भवप्रत्यय अवधिज्ञान होता है और वह भवप्रत्यय अवधिज्ञान उनके साथ आता है। इसलिए पंच कल्याणक वाले तीर्थंकरों के भव प्रत्यय अवधिज्ञान कहा जाता है।



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 18-Dec-2025.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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