Table of Contents

Acharya Shri Umaswami
Read About Acharya Umaswami
here

व्यञ्जनस्यावग्रह:।।१८।।
सूत्रार्थ – व्यंजन का अवग्रह ही होता है।।१८।।

भावार्थ

व्यंजन अर्थात् अस्पष्ट शब्द वगैरह का केवल अवग्रह ही होता है, ईहा आदि नही होते।
Ref: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning

There is only impression (avagraha) of indistinct things – vyańjana.
Ref: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान :व्यंजनावग्रह और अर्थावग्रह में अव्यक्त ग्रहण और व्यक्त ग्रहण की अपेक्षा अन्तर है। जैसे माटी का नया सकोर जल के दो तीन कणों से सिंचने पर गिला नही होता और पुनः-पुनः सिंचने पर वह धीरे-धीरे गिला हो जाता है, इसी प्रकार श्रोत आदि इन्द्रियों के द्वारा किये गये शब्दादि रूप पुद्गल स्कंध दो, तीन समय में व्यक्त नही होते है, किन्तु पुनः-पुनः ग्रहण होने पर व्यक्त हो जाता है। इससे सिद्ध हुआ कि व्यक्त ग्रहण से पहले- पहले व्यंजनावग्रह होता है और व्यक्त अवग्रह का नाम अर्थावग्रह है।

उत्तर : व्यक्त ग्रहण से पहले व्यंजनावग्रह होता है। प्राप्त अर्थ के ग्रहण करने को व्यंजनावग्रह कहते हैं, जैसे स्पर्शनेनिन्द्र्य के द्वारा स्पर्श को ग्रहण करना। व्यक्त शब्दादि के समूह को व्यंजन कहते हैं। छूकर जो रस, स्पर्श, शब्द और गन्ध विषय का ग्रहण होता है, उसे व्यंजनावग्रह निर्दिष्ट किया गया है।



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 18-Dec-2025.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



All Sutras Chapter2


    All Chapters