
Acharya Shri Umaswami
Read About Acharya Umaswami
here
–
अवग्रहेहावायधारणा:।।१५।।
सूत्रार्थ – अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा – ये मतिज्ञान के चार भेद हैं।।१५।।
भावार्थ
अवग्रह, ईहा, आवाय और धारणा, ये चार मतिज्ञान के भेद हैं। इन्द्रिय और पदार्थ का संबंध होते ही जो सामान्य ग्रहण होता है उसे दर्शन कहते हैं। दर्शन के अनन्तर ही जो पदार्थ का ग्रहण होता है वह अवग्रह है। जैसे चक्षु से सफेद रूप को जानना अवग्रह है। अवग्रह से जाने हुए पदार्थ में विशेष जानने की इच्छा का होना ईहा है। जैसे, यह सफेद रूप वाली वस्तु क्या है? यह तो बगुलों की पंक्ति सी ही प्रतीत होती है, यह ईहा है। विशेष चिह्नों के द्वारा यथार्थ वस्तु का निर्णय कर लेना आवाय है। जैसे पंखों के हिलने से तथा ऊपर नीचे होने से यह निर्णय कर लेना यह बगुलों की पंक्ति ही है, यह आवाय है। आवाय से जानी हुई वस्तु को कालान्तर में भी नहीं भूलना धारणा है।
Ref: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
English Meaning
Impression – avagraha, inquisitiveness – īhā, comprehension – avāya, and retention – dhāranā, are the four stages [of sensory knowledge (matijñāna)].
Ref: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
| अवग्रह | ईहा | अवाय | धारणा | |
|---|---|---|---|---|
| स्वरूप | सर्वप्रथम जानना | इच्छा-अभिलाषा | निर्णय | भूलना नहीं |
| कालांतर में | — | संदेह-विस्मरण हो जाता है | संशय तो नहीं, पर विस्मरण होता है |
न संशय, न विस्मरण होता है |
Reference : Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
उत्तर : विषय और विषयों के सम्बन्ध के बाद होने वाले प्रथम ग्रहण को अवग्रह कहते हैं। विषय और विषयों का सन्नीपात होने पर दर्शन होता है। उसके पश्चात जो पदार्थ का ग्रहण होता है वह अवग्रह कहलाता है। जैसे चक्षु इन्द्रिय के द्वारा ‘यह शुक्ल रूप है’ ऐसा ग्रहण करना अवग्रह है। ‘देवता’ इस प्रकार सुनकर जिसके विचार रहित सामान्य में बुद्धि उत्पन्न होती है, उसको अवग्रह निर्दिष्ट किया गया हैं। विषय और विषयी का सम्बन्ध होने पर सफेद आदि की विशेषता से रहित वस्तु की सत्तामात्र के अवभासन रूप निर्वीकल्प दर्शन रूप प्रतीति उत्पन्न होती है, तदनंतर अवग्रह होता है। जैसे उसी दिन के जन्मे बालक के प्रथम बार नेत्र खोलने पर सफेद आदि विशेष वस्तु का प्रतिभास होता है वह सविकल्प अवग्रह स्वरूप है, जैसे वह देखी गई जो वस्तु है वह सफेद है।
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 16-Dec-2025.
Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project
Previous 5 Sutras
All Sutras Chapter2
All Chapters
- Tatvartha Sutra – Chapter 1 – Index
- Tatvartha Sutra – Chapter 2 – Index
- Tatvartha Sutra – Chapter 3 – Index
- Tatvartha Sutra – Chapter 4 – Index
- Tatvartha Sutra – Chapter 5 – Index
- Tatvartha Sutra – Chapter 6 – Index
- Tatvartha Sutra – Chapter 7 – Index
- Tatvartha Sutra – Chapter 8 – Index
- Tatvartha Sutra – Chapter 9 – Index
- Tatvartha Sutra – Chapter 10 – Index