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Acharya Shri Umaswami
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आद्ये परोक्षम्।।११।।
सूत्रार्थ – प्रथम दो ज्ञान परोक्ष प्रमाण हैं।।११।।

भावार्थ

पाँच ज्ञानों में से आदि के दो मतिज्ञान और श्रुतज्ञान परोक्ष प्रमाण है।
Ref: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

The first two kinds of knowledge are indirect (paroksa) knowledge (jñāna).
Ref: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Questions and Answers: शङ्का -समाधान

जैसे मेघ पटल के हटते ही सूर्य का प्रताप और प्रकाश दोनों एक साथ प्रकट होते हैं वैसे ही दर्शन मोहनीय कर्म के उपशम, क्षयोपशम अथवा क्षय से जिस समय आत्मा में सम्यदर्शन प्रकट होता है उसी समय आत्मा के कुमति और कुशीतु ज्ञान मिटकर मतिज्ञान और श्रुतज्ञान रूप होते हैं। अतः सम्यदर्शन और सम्यज्ञान में काल भेद नहीं है। दोनों एक साथ होते हैं। तथा यद्यपि ज्ञान अल्प अक्षर वाला है किंतु अल्प अक्षर वाले से जो पृच्छ होता है वही प्रधान होता है। दर्शन और ज्ञान में दर्शन ही पूज्य है, क्योंकि सम्यदर्शन के होने पर ही मिथ्याज्ञान, सम्यज्ञान हो जाता है। अतः पूज्य होने से सम्यदर्शन को पहले कहा है उसके बाद ज्ञान को रखा है तथा सम्यज्ञानपूर्वक ही सम्यक्चरित्र होता है। इसी से चरित्र को अन्त में रखा है।।१२९।।

Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

उत्तर : उपात्त-अनुपात्त रूप प्रधानता से जो ज्ञान होता है वह परोक्ष कहलाता है। उपात्त – इन्द्रियाँ और मन तथा अनुपात्त -प्रकाश, उपदेशादि को ‘पर’ कहते हैं और पर के निमित्त से होने वाले अर्थावबोध को परोक्ष ज्ञान कहते हैं। समुपात्त (गृहीत) अथवा अनुपात्त (अगृहीत) पर की प्रधानता से जो पदार्थों का ज्ञान होता है उसे परोक्ष प्रमाण कहा गया है। अविशद (अस्पष्ट) प्रतिभास को परोक्ष कहते हैं।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 15-Dec-2025.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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