Tattvartha Sutra – Chapter 8 – Sutra 23
Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – ततश्च निर्जरा ॥२३॥सूत्रार्थ– इसके बाद निर्जरा होती है ॥२३॥ भावार्थ अर्थ : फल दे चुकने पर कर्म की निर्जरा हो जाती है; क्योंकि…
Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – ततश्च निर्जरा ॥२३॥सूत्रार्थ– इसके बाद निर्जरा होती है ॥२३॥ भावार्थ अर्थ : फल दे चुकने पर कर्म की निर्जरा हो जाती है; क्योंकि…
Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – स यथानाम ॥२२॥सूत्रार्थ– वह जिस कर्म का जो जैसा नाम है, उसके अनुरूप होता है ॥२२॥ भावार्थ अर्थ : कर्म का जैसा नाम…
Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – विपाकोऽनुभवः ॥२१॥सूत्रार्थ– विपाक अर्थात् विविध प्रकार के फल देने की शक्ति का पड़ना ही अनुभव है ॥२१॥ भावार्थ अर्थ : विशिष्ट अथवा नाना…
Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – शेषाणामनन्तमुहूर्ताः ॥२०॥सूत्रार्थ– बाकी के पाँच कर्मों की जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है ॥२०॥ भावार्थ अर्थ : ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, आयु और अन्तराय कर्म की…
Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – नामगोत्रयोरष्टौ ॥१९॥सूत्रार्थ– नाम और गोत्र की जघन्य स्थिति आठ मुहूर्त है ॥१९॥ भावार्थ अर्थ : नाम और गोत्र कर्म की जघन्य स्थिति आठ…
Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – अपरा द्वादशमुहूर्ता वेदनीयस्या ॥१८॥सूत्रार्थ– वेदनीय की जघन्य स्थिति बारह मुहूर्त है ॥१८॥ भावार्थ अर्थ : वेदनीय कर्म की जघन्य स्थिति बारह मुहूर्त है।…
Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्यायुषः ॥१७॥सूत्रार्थ– आयु की उत्कृष्ट स्थिति तैंतीस सागरोपम है ॥१७॥ भावार्थ अर्थ : आयु कर्म की उत्कृष्ट स्थिति तैंतीस सागर प्रमाण है। यह…
Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – विंशतिर्नामगोत्रयोः ॥१६॥सूत्रार्थ– नाम और गोत्र की उत्कृष्ट स्थिति बीस कोटाकोटी सागरोपम है ॥१६॥ भावार्थ अर्थ : नाम और गोत्र कर्म की उत्कृष्ट स्थिति…
Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – सप्ततिर्मोहनियस्य ॥१५॥सूत्रार्थ– मोहनीय की उत्कृष्ट स्थिति सत्तर कोटाकोटी सागरोपम है ॥१५॥ भावार्थ अर्थ : मोहनीय कर्म की उत्कृष्ट स्थिति सत्तर कोडाकोड़ी सागर प्रमाण…
Acharya Shri UmaswatiRead About Acharya Umaswamihere – आदितस्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थिति: ॥१४॥सूत्रार्थ– आदि की तीन प्रकृतियाँ अर्थात् ज्ञानावरण, दर्शनावरण और वेदनीय तथा अन्तराय इन चारों के उत्कृष्ट स्थिति तीस…