
Acharya Shri Umaswati
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मोहक्षयज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच्च केवलम् ॥१॥
मोह का क्षय होने से तथा ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय कर्म का क्षय होने से केवलज्ञान प्रकट होता है ॥१॥


भावार्थ
अर्थ : मोहनीय कर्म के क्षय से और फिर ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय कर्म का एक साथ क्षय होने से केवल ज्ञान प्रकट होता है। सारांश यह है कि पहले मोहनीय कर्म को क्षय करके अन्तर्मुहूर्त तक क्षीण कषाय नाम के गुणस्थान में जीव रहता है। फिर उसके अन्त में ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय कर्म को एक साथ नष्ट करके केवल ज्ञान को प्राप्त कर लेता है। इसी से मोहक्षयात् पद अलग लिखा है ॥१॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf
English Meaning:
Omniscience or perfect knowledge – kevalajñāna – is attained on destruction of delusion (moha), and on destruction of knowledge-covering (jñānāvarana), perception-covering (darśanāvarana) and obstructive (antarāya) karmas.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain

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मोक्ष के पहले केवलज्ञान की उत्पत्ति
| घातिया कर्म | क्षय किस गुणस्थान में |
|---|---|
| 1. दर्शन मोहनीय | 4 से 7 किसी एक में |
| 2. चारित्र मोहनीय | 10 के अंत में |
| 3. ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अंतराय | 12 के अंत में |
| फल: | केवलज्ञान की उत्पत्ति 13वें गुणस्थान में |
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: केवलज्ञान, संवर के द्वारा जिसकी परम्परा की जड़ काट दी गई है तथा संयमचारित्र और ध्यान रूपी अग्नि के द्वारा जिसकी सत्ता का सर्वथा लोप कर दिया गया है उस मोहनीय कर्म के मूल से क्षय हो जाने पर तथा ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय कर्म के क्षय होते ही केवलज्ञान की उत्पत्ति होती है- केवलज्ञान उत्पन्न होता है। जब संसार का बीजभूत मोहनीय कर्म सम्पूर्ण रूप से नष्ट हो जाता है तब तदनन्तर अन्तराय, ज्ञानावरण और दर्शनावरण ये तीन कर्म एक साथ सम्पूर्ण रूप से नष्ट हो जाते हैं। जिस प्रकार गर्भसूची के नष्ट होने पर बालक मर जाता है उसी प्रकार मोहनीय कर्म के नष्ट होने पर उक्त (ज्ञानावरणादि तीन कर्म) नष्ट हो जाते हैं।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
उत्तर : सूत्र में समास न करके मोहक्षय का पृथक प्रयोग क्रमिक क्षय की सूचना देने के लिए है, क्योंकि प्रथम मोहनीय कर्म का क्षय करके अन्तर्मुहूर्त तक क्षीणकषाय पद को प्राप्त करके तदनन्तर एक साथ ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय कर्मों का क्षय करके केवलज्ञान प्राप्त करता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 9-Mar-2026
Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project
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