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Acharya Shri Umaswati
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मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो नृलोंके ॥१३॥
सूक्ष्मार्थ– ज्योतिषी देव मनुष्यलोक में मेरु की प्रदक्षिणा करते हैं और निरन्तर गतिशील हैं ॥१३॥


भावार्थ

अर्थ: ज्योतिषी देव मनुष्य लोक में मेरु की प्रदक्षिणा रूप से सदा गमन करते रहते हैं।
Reference: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

The luminary deva (jyotisī deva) of the human region (manusyaloka, nrloka), move incessantly round Mount Meru, from left to right – merupradaksinā.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain



Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: गति-अन्तर की निवृत्ति के लिए ‘मेरुप्रदक्षिणा’ पद दिया है। मेरु की प्रदक्षिणा (परिक्रमा) को मेरुप्रदक्षिणा कहते हैं। ज्योतिषी देवों का गत्यन्तर वा अन्य प्रकार से गमन नहीं होता, उनकी विपरीत गति की निवृत्ति के लिए मेरुप्रदक्षिणा विशेषण दिया है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

उत्तर: नित्य गति कहना अयुक्त नहीं है क्योंकि गतिपरिणत आभियोग्य जाति के देवों के द्वारा इनके विमान ढोए जाते हैं। अतः वे नित्यगतिक हैं। इनका कर्मज उदय में ही किया है। उनके कर्मफल की विचित्रता है। कर्मो का फल अनेक प्रकार से पकता है, इन देवों के ऐसे ही कर्म का उदय है जिससे इन्हें विमानों को वहन करके ही अपना कर्मफल भोगना पड़ता है, ऐसा मानना चाहिए।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on – 21 February 2026.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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