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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
अर्पितानर्पित-सिद्धेः ॥३२॥
Meaning
मुख्यता (प्रधानता या विवक्षा) तथा गौणता ( अप्रधानता या अविवक्षा) से अनेक धर्म वाली वस्तु का कथन होता है॥३२॥

भावार्थ

वस्तु में विवक्षित और अविवक्षित अनेक धर्म रहते हैं। पितृत्व, पुत्रत्व और मातुलत्व आदि की तरह एक ही वस्तु में अनेक धर्म रहने पर भी विरोध नहीं आता। उन अनेक धर्मों में वक्ता जिस धर्म को कहने की इच्छा करता है वह धर्म अर्पित (विवक्षित या मुख्य ) कहलाता है और वक्ता उस समय जिस धर्म को नहीं कहना चाहता है। वह धर्म अनर्पित (अविवक्षित या गौण) कहलाता है। जैसे वक्ता यदि द्रव्यार्थिकनय से वस्तु का कथन करेगा तो वस्तु की नित्यता विवक्षित कहलायेगी और यदि पर्यायार्थिक नय से वस्तु का कथन करेगा तो वस्तु की अनित्यता विवक्षित होगी ।जिस समय किसी वस्तु को द्रव्य की अपेक्षा नित्य कहा जाता है उसी समय वस्तु पर्याय की अपेक्षा अनित्य भी है। परन्तु वह अनित्यता कही नहीं जा रही, क्योंकि दो धर्म एक साथ कहे नहीं जा सकते। किन्तु एक साथ रह सकते हैं।Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष Link to book

English Meaning:

The seemingly contradictory attributes (dharma) are established from the points of view, whether primary (arpita) or secondary (anarpita). Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


स्याद्वाद शैली
flowchart TB

A["स्याद्वाद शैली"]
B["(जैनधर्म का आधार स्तम्भ सूत्र)"]

A --> B
B --> C
B --> D

C["अर्पित<br/>(मुख्य)"]
D["अनर्पित<br/>(गौण)"]
वस्तु अनेकान्तात्मक अर्थात् अनेक धर्मों वाली है। जैसे – वस्तु नित्यानित्यात्मक है। चूँकि वक्ता अनेक धर्मों को एक साथ कह नहीं सकता है। वह एक समय में एक ही धर्म को कह सकता है। अतः वह एक धर्म को अर्पित (मुख्य) एवं अन्य धर्मों को अनर्पित ( गौण ) करके कथन करता है।

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer अर्पित (विवक्षा) एवं अनर्पित (अविवक्षा) की अपेक्षा एक ही पदार्थ में दोनों धर्मों की सिद्धि होती है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer यदि केवल द्रव्यार्थिक नय की विषयभूत वस्तु मानी जाय तो व्यवहार का लोप हो जाएगा क्योंकि पर्यायशून्य केवल द्रव्य रूप वस्तु का अभाव है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 13-feb-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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