
Acharya Shri Umaswati
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परेऽप्रवीचारा: ॥९॥
सूत्रार्थ- बाकी के सब देव विषय-सुख से रहित होते हैं ॥९॥

भावार्थ
अर्थ: यहाँ ‘पर’ शब्द से समस्त कल्पातीत देवों का ग्रहण किया गया है। अतः अच्युत स्वर्ग से ऊपर नौ ग्रैवेयक, नौ अनुदिश और पाँच अनुत्तरों में रहने वाले अहमिन्द्र देवों में काम सेवन नही है क्योंकी वहाँ देवानाएँ नहीं होता है। अतः काम भोगरूप वेदना के न होने से ऊपर के देव सुख परम सुखी हैं ॥९॥
Reference: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
English Meaning:
The rest do not indulge in copulation – they are without pravīcāra.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain

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प्रवीचार (मैथुन-काम सेवन)
| कैसे प्रवीचार | काय | स्पर्श | रूप | शब्द | मन | प्रवीचार रहित |
| स्वरूप | मनुष्य के समान संक्लेश पूर्वक शरीर के द्वारा | शरीर के स्पर्श करने मात्र से | सुन्दर श्रृंगार, आकार, विलास, चतुर, मनोज्ञ वेश रूप, लावण्य के देखने मात्र से | मधुर गीत, कोमल हास्य, कामुक वचन, आभूषणों की ध्वनि सुनने से | एक-दूसरे का मन में संकल्प मात्र करने से | विषय वेदना का अभाव |
| कौन-कौन से स्वर्ग में | भवनवासी व्यंतर ज्योतिषी पहला, दूसरा स्वर्ग (1-2) | तीसरा, चौथा स्वर्ग (3-4) | पाँचवें से आठवें स्वर्ग (5-8) | नौवें से बारहवें स्वर्ग (9-12) | तेरहवें से सोलहवाँ स्वर्ग (13-16) | कल्पातीत |
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: सूत्र में ‘परे’ शब्द कल्पातीत सर्व देवों का ग्रहण करने के लिए है। कल्पातीत सर्व देवों का संग्रह करने के लिए ‘परे’ वचन का ग्रहण किया है, यदि ‘परे’ शब्द का ग्रहण न करते तो अनिष्ट अर्थ का (ग्रैवेयकादि में स्पर्शादि प्रविचार भी है और अप्रविचार भि है) ग्रहण हो जाता इसलिए अनिष्ट अर्थ का निराकरण करने के लिए सूत्र में ‘परे’ शब्द का ग्रहण किया गया है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
उत्तर: उन कल्पातीत देवों के काम-वेदना से उत्पन्न पीड़ा का परिक्षय हो जाने से और प्रकृष्ट सुख की प्राप्ति होने से उनके प्रवीचार नहीं है। जिस प्रकार यहाँ भी मनुष्यों के काम-वेदना की तरतमता और अभाव देखा जाता है उसी प्रकार उन अहमिन्द्रों में प्रवीचार का अभाव संभव है। कल्पातीत (नवग्रेवेयक से सर्वार्थसिद्धि पर्यन्त) देव मोह का उदय अव्यक्त होने से प्रवीचार रहित हैं। वहाँ के अहमिन्द्र शान्ति प्रधान सुख से युक्त होते हैं।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on – 12 February 2026.
Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project
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