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Acharya Shri Umaswati
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संख्येयासंख्येयाश्चपुद्गलानाम् ॥१०॥
सूत्रार्थ– पुद्गलों के संख्यात, असंख्यात और अनन्त प्रदेश हैं ॥१०॥


भावार्थ

अर्थ : यहाँ ‘च’ शब्द से अनंत लेना चाहिए। अतः किसी पुद्गल द्रव्य के संख्यात प्रदेश हैं, किसी के असंख्यात हैं और किसी के अनंत हैं। आशय यह है कि शुद्ध पुद्गल द्रव्य तो एक अविभागी परमाणु है। किंतु परमाणुओं में बँधने और बिछुड़ने की शक्ति है। अतः परमाणु के मेल से स्कन्ध बनता है। सो कोई स्कन्ध तो दो परमाणुओं के मेल से बनता है, कोई तीन के, कोई चार के, कोई संख्यात के, कोई असंख्यात कें और कोई अनंत परमाणुओं के मेल से बनता है। अतः कोई संख्यात प्रदेशी होता है, कोई असंख्यात प्रदेशी होता है और कोई अनंत प्रदेशी होता है।
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

The space-points (pradesa) of the matter (pudgala) are numerable (samkhyata), innumerable (asamkhyata ) and infinite (ananta).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: पुद्गल द्रव्य में दो तरह का परिणमन होता है एक सूक्ष्म और दूसरा स्थूल । जब उसमें सूक्ष्म परिणमन होता है तब लोकाकाश के एक प्रदेश में भी अनन्त प्रदेश बाला पुद्गल स्कन्ध स्थान पा लेता है। इसके सिवाय समस्त द्रव्यों में एक दूसरे को अवगाहन देने की सामर्थ्य है, जिसमें अल्पक्षेत्र में ही समस्त द्रव्यों के निवास में कोई बाधा नहीं होती ।
Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूषLink to book

उत्तर : सूक्ष्म भाव से परिणत परमाणु एक-एक आकाशप्रदेश पर अनन्तानन्त अवस्थित है अतः पुद्गलों के सूक्ष्म परिणमन और आकाश की अवगाहना शक्ति के कारण अनन्तानन्त पुद्गलों के स्कन्ध का भी अवगाह हो जाता है। जैसे – संकुचित चम्पा की कली में सूक्ष्म रूप से बहुत से गन्ध के अवयव रहते हैं और जब वे फैलते हैं, विस्तरित होते हैं, स्थूल प्रचय परिणाम से बाहर निकलते है तब सब दिशाओं को व्याप्त कर लेते हैं, ऐसा देखा जाता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 11-feb-2026

Courtesy:
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