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Acharya Shri Umaswati
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शेषाः स्पर्शरूपशब्दमनः प्रवीचाराः ॥८॥
सूत्रार्थ- शेष देव स्पर्श, रूप, शब्द और मन से विषय-सुख भोगने वाले होते हैं ॥८॥


भावार्थ

अर्थ: शेष स्वर्गों के देव स्पर्श, रूप, शब्द और मन से ही मैथुन सेवन करते हैं। अर्थात सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्ग के देव अपनी अपनी देवियों के आलिंगन मात्र से ही परम संतुष्ट हो जाते हैं। यही बात देवियों की भी है। ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लांतव और कापिष्ट स्वर्ग के देव अपनी अपनी देवियों के सुंदर रूप, श्रृंगार, विलास वगैरह के देखने मात्र से ही संतुष्ट हो जाते हैं। शुक्र, महाशुक्र, शतार और सहस्रार स्वर्ग के देव अपनी अपनी देवियों के मधुर गीत, कोमल हास्य, मीठे वचन तथा आभूषणों का शब्द सुनने से ही तृप्त हो जाते हैं। आनत, प्राणत, आरण और अच्युत स्वर्ग के देव अपनी अपनी देवियों का मन में चिंतन कर लेने से ही शांत हो जाते हैं ॥८॥
Reference: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

The others indulge in ‘pravīcāra’ through touch (sparśa), sight (rūpa), sound (śabda) and thought (mana).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: सानत्कुमार-माहेन्द्र स्वर्ग में अंगस्पर्श से, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर, लांतव-कापिष्ट स्वर्ग में रूप देखकर, शुक्र-महाशुक्र शतार-सहस्रार स्वर्ग में शब्द से, आनत-प्राणत, आरण-अच्युत स्वर्ग में मन से प्रवीचार होता है। देवियों का प्रवीचार भी अपने-अपने देवों के समान इसी प्रकार जानना चाहिए।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

उत्तर: मोह का मध्यम उदय होने से सानत्कुमार से लेकर सहस्रार स्वर्ग के देवों के स्पर्श आदि से प्रवीचार होता है, मोह का उदय अत्यन्त मन्द होने से आनतादि स्वर्ग में मन से प्रवीचार होता है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on – 11 February 2026.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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