
Acharya Shri Umaswati
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चतुर्दश- नदी- सहस्र परिवृता गङ्गा-सिन्ध्वादयो नद्यः ॥२३॥
सूत्रार्थ– गंगा और सिन्धु आदि नदियों की चौदह चौदह हजार परिवार नदियाँ हैं ||२३||
भावार्थ
अर्थ: गंगा और सिन्धु नदी चौदह चौदह हजार परिवार नदियों से घिरी हुई है। इस सूत्र में जो ‘नदी’ शब्द दिया है वह यह बतलाने के लिए दिया है कि इन नदियों का परिवार आगे आगे दूना दूना होता गया है। अतः रोहित और रोहितास्या की परिवार नदी अट्ठाईस- अट्ठाईस हजार है। हरित् और हरिकांता की परिवार नदी छप्पन छप्पन हजार है। सीता और सीतोदा की परिवार नदी एक लाख बारह हजार, एक लाख बारह हजार है |
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf
English Meaning:
The rivers Gańgā, Sindhu, etc., have 14,000 tributaries.
Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain

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14 नदियाँ – परिवार नदियों का विवरण
| समूह | नदियों के नाम | बहने का क्षेत्र | किस दिशा में जाती हैं | परिवार नदियाँ |
|---|---|---|---|---|
| पश्चिम | सिन्धु | भरत | लवण समुद्र में | 14,000 |
| गंगा | भरत | लवण समुद्र में | 14,000 | |
| महाव्रत | हरितास्या | हैमवत | दूसरी समुद्र में | 28,000 |
| रोहित | हैमवत | दूसरी समुद्र में | 28,000 | |
| हिरण्य | हरिकान्ता | हरि | तीसरी (जैसे गंगा) | 56,000 |
| हरित् | हरि | तीसरी | 56,000 | |
| विदेह | सीतोदा | विदेह | पुष्कर समुद्र में | 1,12,000 |
| सीता | विदेह | पुष्कर समुद्र में | 1,12,000 | |
| रम्यक | रक्ता | रम्यक | पूर्व-पश्चिम | 56,000 |
| रक्तदा | रम्यक | पूर्व-पश्चिम | 56,000 | |
| हैरण्यवत | सुग्रिवा | हैरण्यवत | पश्चिम समुद्र में | 28,000 |
| सुवर्णकूला | हैरण्यवत | पश्चिम समुद्र में | 28,000 | |
| ऐरावत | रक्ता | ऐरावत | पश्चिम समुद्र में | 14,000 |
| रक्ता | ऐरावत | पश्चिम समुद्र में | 14,000 |
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Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: गन्ना- सिन्धु आदि नदियों की परिवार नदियों का कथन करने के लिए यह सूत्र कहा गया है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
उत्तर : नदियों का प्रकरण होने पर भी पुनः गङ्गा-सिन्धु का ग्रहण अनर्थक नहीं है। यदि गङ्गा- सिन्धु आदि का ग्रहण नहीं होता तो अनंतर के ग्रहण का प्रसंग आता है। क्योंकि अनंतर की विधि और अनंतर का ही निषेध होता है। यह व्याकरण का नियम है। अतः गङ्गा सिन्धु का ग्रहण नहीं करने से ‘’अपरगाः’ यह शब्द निकट है। इसका ग्रहण होता है। गङ्गा-सिन्धु आदि नदियाँ चौदह हजार-चौदह- हजार परिवार नदियों से युक्त है। ऐसा अर्थ नहीं होता ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
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Diksha Jain created this page on 6-feb-2026
Courtesy:
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