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Acharya Shri Umaswati
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संसारिणो मुक्ताश्च॥१०॥
सूत्रार्थ: जीव दो प्रकार के हैं– संसारी और मुक्त ॥१०॥

भावार्थ

अर्थ: संसारी और मुक्त के भेद से जीव दो प्रकार के होते हैं।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

English Meaning:

Souls are of two kinds: the transmigrating (sansārī) and the liberated (mukta).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: कर्मविपाक के वश से आत्मा को भवांतर की प्राप्ति होना संसार है। संसरण करने को संसार कहते हैं जिसका अर्थ परिवर्तन है। जीव एक शरीर को छोड़ता है और दूसरे नए शरीर को ग्रहण करता है। एक बार उसे छोड़कर दूसरा नया शरीर धारण करता है। इस प्रकार अनेक बार शरीर को ग्रहण करता है और अनेक बार उसे छोड़ता है। मिथ्यात्व कषाय आदि से युक्त जीव का इस प्रकार अनेक शरीरों में जो संसरण होता है उसे संसार कहते हैं। जिस घातिकर्मसमूह के कारण जीव चारों गतियों में संसरण करते हैं, वह घातिकर्मसमूह संसार है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

उत्तर: यह संसारी जीव सुख पाने की इच्छा से इन्द्रियों से उत्पन्न ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य को शरीर में ही निहित मानता है। इस उन्हें पाने के लिए पर-वस्तुओं का आश्रय लेना पड़ता है। कर्मबंधन से बंधे रहने के कारण यह संसार से मुक्त नहीं हो पाता है। ये गुणस्थान और मार्गणास्थानों में स्थित हैं। नरक, तिर्यञच, देव, मनुष्य इन चार गतियों में भ्रमते है। पर्यायों की अपेक्षा अनेक भेद-प्रभेद वाले होते हैं।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on – 4 February 2026.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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