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Acharya Shri Umaswami
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तदनन्तभागे मनःपर्ययस्य॥२८॥
सूत्रार्थ – मनःपर्ययज्ञान की प्रवृत्ति अवधिज्ञान के विषय के अनन्तवें भाग में होती है॥२८॥

भावार्थ

अवधिज्ञान के विषयभूत रूपी द्रव्य के (सूक्ष्म) अनन्तवें भाग में मनःपर्यय ज्ञान की प्रवृत्ति होती है।
Ref: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning

The scope of telepathy (manahparyayajñāna) is the infinitesimal part of the matter ascertained by clairvoyance (avadhijñāna).
Ref: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: नहीं जानता, क्योंकि अनादि-अनन्त पर्यायों को जानने वाले ज्ञान का आवरण करने वाले कर्मों का क्षयोपशम होना असंभव है। त्रिकाल संबंधी अनन्तानन्त पर्यायों को ज्ञानावरण कर्म के क्षय से वृद्धी को प्राप्त केवलज्ञान ही जान सकता है। इसलिए ‘असर्वपर्याययेषु’ पद की अनुवृत्ती पूर्व सुत्र २६ से करके मनःपर्यय ज्ञान को भी कुछ पर्यायों को जानने वाला ही मानना चाहिए।

उत्तर : देशावधिज्ञान का उत्कृष्ट विषयभूत द्रव्य कार्माण वर्गणा है। उसमें असंख्यात बार अनन्त संख्या वाले धृवाहारों का भाव देने पर परमावधि ज्ञान का विषयभूत द्रव्य प्राप्त होते हैं। उस परमावधिज्ञान के द्रव्य में अनन्त का भाग देने पर अनन्त भागपने को प्राप्त स्कन्ध सर्वाविधिज्ञान का विषय होता है।



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 19-Dec-2025.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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