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Acharya Shri Umaswami
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विशुद्ध्यप्रतिपाताभ्यां तव्दिशेष:।।२४।।
सूत्रार्थ – विशुद्धि और अप्रतिपात की अपेक्षा इन दोनों में अन्तर है।।२४।।

भावार्थ

ऋजुमति और विपुलमति में विशुद्धि और अप्रतिपात की अपेक्षा से विशेषता है। मनःपर्यय ज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम से जो आत्मा में उज्ज्वलता होती है वह विशुद्धि है। और संयम परिणाम की वृद्धि होने से गिरावट का न हो ना अप्रतिपात है। ऋजुमति से विपुलमति अधिक विशुद्ध होता है। तथा ऋजुमति होकर छूट भी जाता है किन्तु विपुलमति वाले का चारित्र वर्धमान ही होता है, अतः केवलज्ञान उत्पन्न होने तक बराबर बना रहता है।
Ref: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning

The differences between the two are due to purity (viśuddhi) and infallibility (apratipāta).
Ref: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: विशुद्धि की अपेक्षा ऋजुमति मनःप्रर्यय ज्ञान से विपुलमति मनःप्रर्ययज्ञान द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की अपेक्षा विशुध्दतर है। तथा अप्रतिपाती की अपेक्षा विपुलमति विशिष्ट है क्योंकी इसमे स्वामीयों के प्रवर्धमान चारित्र पाया जाता है।। परन्तु ऋजुमति प्रतिपाती है, क्योंकि इनके स्वामियों के कषाय के उदय से घटता हुआ चारित्र पाया जाता है। Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

उत्तर : चारित्र मोहनीय कर्म के उद्रेक से सय्यम के शिखर से च्युत हुए उपशान्त कषायी जीवों का मनःप्रर्ययज्ञान प्रतिपाती होता है। परंतु क्षीणकषायी बारहवें गुणस्थानवर्ती जीवों के प्रतिपाती करणों का अभाव होने से अप्रतिपाती होता है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 12-Dec-2025.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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