Table of Contents

Acharya Shri Umaswami
Read About Acharya Umaswami
here

तदिन्द्रियानिन्द्रियानिमित्तम्।।१४।।
सूत्रार्थ – वह (मतिज्ञान) इन्द्रिय और मन के निमित्त से होता है।।१४।।

भावार्थ

(तत्) वह मति-ज्ञान (इन्द्रियानिन्द्रिय) इन्द्रिय और अनिन्द्रिय (मन) (निमित्त) की सहायता से होता है।
Ref: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning

That – sensory-knowledge (matijñāna) – is caused by the senses (indriya) and the mind (mana).
Ref: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


flowchart TB
    A["मतिज्ञान की उत्पत्ति"] --> B["५ इन्द्रिय<br>इन्द्रिय<br>(आत्मा की पहचान के चिन्ह)"] & C["मन<br>अनिन्द्रिय / नोइन्द्रिय<br>(किंचित् इन्द्रिय)"]

    style A fill:#FF6D00
    style B fill:#FFE0B2
    style C fill:#FFF9C4

Reference : Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-ChabdaLink


Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान : यद्यपि मतिज्ञान का प्रकरण होने से मतिज्ञान का सम्बन्ध हो ही जाता है, इसलिए ‘तत्’ शब्द के ग्रहण की आवश्यकता नहीं है फिर भी आगे के सुत्र में कहे जाने वाले प्रश्न अवग्रह, ईहा, अवाय, धारणा— मतिज्ञान के भेद हैं, इनको जानना अशक्य हो जाता, अतः तत् शब्द का पुनःग्रहण करने पर अवग्रह आदि भी मतिज्ञान के भेद है, यह सम्बन्ध सुगम हो जाता है। इस सूत्र के लिये और आगले सूत्र के लिये ‘तत्’ पद का निर्देश किया है। मती आदि पर्यायवाची शब्दों के द्वारा जो ज्ञान कहा गया है, वह इन्द्रिय और अनिंद्रिय के निम्मित से होता है और उसी के अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा से चार भेद हैं। इसलिए पूर्वोक्त दोष प्राप्त नही होता। अर्थात ‘तत्’ पद व्यर्थ नही है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

उत्तर : इन्द्र शब्द का अर्थ आत्मा है। वह ज्ञ स्वभावी है। उसके मतिज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम के रहते हुए भि वह स्वयं पदार्थों को जानने में असमर्थ है अतः उस पदार्थ के जानने में जो लिंग होता है वह इन्द्र का लिंग इन्द्रियाँ कही जाती है। जिस प्रकार लोक में धूम अग्नि का ज्ञान कराने में कारण होता है, उसी प्रकार स्पर्शनादि करण कर्ता आत्मा के अभाव में नही हो सकता हैं अतः उनसे ज्ञाता का अस्तित्व जाना जाता हैं। इन्द्र अर्थात आत्मा के अर्थ में उपलब्धि के कारण को इन्द्रिय कहते हैं। इन्द्र अर्थात आत्मा। कर्ममलीमस आत्मा सावरण होने से अर्थोपलब्धि में जो लिंग (कारण) होते हैं, उसे इन्द्रिय कहते हैं।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 16-Dec-2025.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



All Sutras Chapter2


    All Chapters