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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
तद्भावः परिणामः ॥ ४२ ॥
Meaning
धर्मादि द्रव्य जिस स्वरूप से होते हैं उसे तद्भाव कहते हैं। और उस तद्भाव का ही नाम परिणाम है॥ ४२ ॥

भावार्थ

जिस द्रव्य का जो स्वभाव है वही परिणाम है। जैसे धर्म द्रव्य का स्वभाव जीव पुद्गलों की गति में निमित्त होना है। वही तद्भाव है। धर्म द्रव्य का परिणमन सदा उसी रूप में होता है। इसी प्रकार अन्य द्रव्यों में भी समझ लेना चाहिए ॥ ४२ ॥ Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

The condition (change) of a substance is its transforma- tion – pariņāma. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


परिणाम (भाव)
flowchart TB

A["परिणाम (भाव)"]

A --> B["अनादि (प्रवाह अपेक्षा)"]

A --> C["सादि (प्रति समय नया-नया)"]
B --> D["1 धर्मादि 4 द्रव्य - दोनों परिणाम आगम से जाने जाते हैं।  <br/> 2 जीव और पुद्गल - दोनों परिणाम कदाचित् प्रत्यक्षगम्य हैं।"]
C --> D

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer दोनों नयों के कारण सब द्रव्यों में सादि एवं अनादि दोनों परिणामों की सिद्धि होती है। पर्यायार्थिक नय की विवक्षा से सर्व धर्मादि द्रव्यों में परिणाम सादि हैं और द्रव्यार्थिक नय की विवक्षा से सभी द्रव्यों के परिणाम अनादि हैं। विशेषता यह है कि धर्मादि चार अतीन्द्रिय द्रव्यों का आदि और अनादिमान परिणाम आगम से जाना जाता है और जीव तथा पुद्गलों का परिणाम कथंचित् प्रत्यक्षगम्य भी होता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 13-feb-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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