
Acharya Shri Umaswati
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Sutra
वर्तनापरिणामक्रियाः परत्वापरत्वे च कालस्य ॥२२॥
Meaning
[ वर्तना परिणाम क्रियाः परत्वापरत्वे च ] वर्तना, परिणाम, क्रिया, परत्व और अपरत्व [ कालस्य ] ये काल द्रव्य के उपकार हैं॥२२॥

भावार्थ
प्रति समय छहों द्रव्यों में जो उत्पाद, व्यय और धौव्य होता रहता है। इसी का नाम वर्तना है। यद्यपि सभी द्रव्य अपनी-अपनी पर्याय रूप से प्रति समय स्वयं ही परिणमन करते हैं किंतु बिना बाह्य निमित्त के कोई कार्य नहीं होता । और उसमें बाह्य निमित्त काल है। अतः वर्तना को काल का उपकार कहा जाता है। अपने स्वभाव को न छोड़कर द्रव्यों की पर्यायों के बदलने को परिणाम कहते हैं। जैसे जीव के परिणाम क्रोधादि हैं और पुद्गल के परिणाम रूप रसादि हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान में गमन करने का नाम क्रिया है। यह क्रिया जीव और पुद्गलों में ही पाई जाती है। जो बहुत दिनों का होता है उसे पर कहते हैं और जो थोड़े दिनों का होता है उसे अपर कहते हैं। ये सब कालकृत उपकार हैं। यद्यपि परिणाम वगैरह वर्तना के ही भेद हैं किंतु काल के दो भेद बतलाने के लिए उनका सबका ग्रहण किया है। काल द्रव्य दो प्रकार का है- निश्चय काल और व्यवहार काल । निश्चय काल का लक्षण वर्तना है और व्यवहार काल का लक्षण परिणाम वगैरह है। जीव पुद्गलों में होने वाले परिणमन में ही हैं व्यवहारकाल घड़ी, घंटा वगैरह जाने जाते हैं। उसके तीन भेद हैं भूत, वर्तमान और भविष्य। इस घड़ी, मुहूर्त, दिन, रात वगैरह में होने वाले काल के व्यवहार से मुख्य निश्चयकाल का अस्तित्व जाना जाता है, क्योंकि मुख्य के होने से ही गौण व्यवहार होता है। अतः लोकाकाश के प्रत्येक प्रदेश पर जो एक एक कालाणु स्थिर है वही निश्चय काल है। उसी के निमित्त से वर्तना वगैरह उपकार होते हैं ॥ २२ ॥Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
English Meaning:
Assisting substances in their continuity of being through gradual changes (vartanā), in their modification (pariņāma), in their movement (kriyā), in their endurance (paratva) and in their non-endurance (aparatua), are the functions of time (kāla). Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
काल का उपकार
flowchart TD A["काल का उपकार"] A --> B["वर्तना (परिणमन में निमित्त)"] A --> C["परिणाम (पर्याय)"] A --> D["क्रिया (हलन - चलन)"] A --> E["परत्व (बहुत समय लगना)"] A --> F["अपरत्व (थोड़ा समय लगना)"] B --> G["निश्चय काल का उपकार"] C --> H["व्यवहार काल का उपकार"] F --> H
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
Answer प्रत्येक द्रव्यपर्याय में अन्तनत एक समय वाली स्वसत्ता की अनुभूति वर्तना है । एक अविभागी समय में धर्मादि छहों द्रव्य आदिमान् और अनादिमान् उत्पाद व्यय और ध्रौव्य के विकल्प रूप अपनी-अपनी पर्यायों के द्वारा वर्तना करते हैं, उस विषय को वर्तना कहते हैं ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
Answer यदि सत् (द्रव्य) अवश्य उपकारी ही होना चाहिए तो काल को भी ‘सत्’ द्रव्य माना है, उसका क्या उपकार है ? ऐसा पूछने पर आगे कहे जाने वाले स्वतत्त्व अमूर्त्तिक काल द्रव्य का उपकार बताने के लिए यह सूत्र कहा है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
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Diksha Jain created this page on 12-feb-2026
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