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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
अजीव काया धर्माधर्माकाश- – पुद्गलाः ॥१॥
Meaning
[ धर्माधर्माकाशपुद्गलाः ] धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य, आकाश और पुद्गल ये चार [ अजीवकायाः ] अजीव तथा ‘काय’—बहु प्रदेशी – हैं।

भावार्थ

वैसे द्रव्य तो छह हैं। उनमें पाँच द्रव्य अजीव हैं। केवल एक द्रव्य जीव है। तथा छह द्रव्यों में पाँच द्रव्य अस्तिकाय हैं और एक काल द्रव्य अस्तिकाय नहीं है । अतः जीव द्रव्य काय रूप हैं किंतु अजीव नहीं है और काल द्रव्य अजीव है किंतु काय रूप नहीं है। इसलिए जीव और काल के सिवा शेष चार द्रव्यं ही ऐसे हैं जो अजीव भी हैं और काय भी हैं। जिस द्रव्य में चैतन्य नहीं पाया जाता उसे अजीव कहते हैं और बहुत प्रदेश होता है उसे काय कहते हैं । ऐसे द्रव्य चार ही हैं- धर्म, अधर्म, और पुद्गल । गमन करते हुए जीव और पुद्गलों को जो गमन में सहायक होता है, उसे धर्म द्रव्य कहते हैं। ठहरते हुए जीव और पुद्गलों को जो ठहराने में सहायक होता है उसे अधर्म द्रव्य कहते हैं । समस्त द्रव्यों को अवकाश देने में सहायक द्रव्य को आकाश द्रव्य कहते हैं और जिसमें रूप, रस, गंध और स्पर्श गुण पाए जाते हैं उसे पुद्गल द्रव्य कहते हैं ॥ १ ॥ Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

The non-soul substances (bodies) – ajīvakāya – are the medium of motion (dharma), the medium of rest (adharma), the space (ākāśa) and the matter (pudgala).Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain



Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer कोई सबको जीवात्मक स्वीकार करते हैं, उनके प्रति धर्मादिकों में अजीवपने का प्रतिपादन करने के लिए सूत्र में ‘अजीवा:’ पद का ग्रहण किया है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

Answer सूत्र में ‘काय’ पद का ग्रहण प्रदेशों या अवयवों की बहुतायत को सूचित करने के लिए है। मुख्य रूप से धर्मादि द्रव्यों के न रहने पर भी श्रोतृजन को सुखपूर्वक ज्ञान कराने के लिए द्रव्य परमाणु की अवगाहना मात्र से (एक परमाणु के द्वारा रोके गये आकाशप्रदेश के माप से) बुद्धि के द्वारा ‘प्रदिष्यते इति प्रदेशा:’ उनमें भेद किये जाते हैं, वे प्रदेश हैं, प्रदेश ही अवयव हैं, वह प्रदेशावयव है । उनके बहुत्व का ज्ञान कराने के लिए काय शब्द है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



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Diksha Jain created this page on 11-feb-2026

Courtesy:
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