
Acharya Shri Umaswati
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ज्योतिष्का: सूर्याचन्द्रमसौग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकश्च ॥१२॥
सूत्रार्थ- ज्योतिषी देव पाँच प्रकार के हैं – सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र और प्रकीर्णक तारे ॥१२॥

भावार्थ
अर्थ: ज्योतिष्क देव पाँच प्रकार के होते हैं– सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र और सर्वत्र फैले हुए तारे। चूँकि ये सब चमकीले होते हैं इसलिए इन्हें ज्योतिष्क कहते हैं।
Reference: TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
English Meaning:
The stellar (jyotiska) deva comprise the sun (sūrya), the moon (candramā), the planets (graha), the constellations (naksatra) and the scattered stars (tāre).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain

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देवों के प्रकार (निकाय)
| नाम | भवनवासी | व्यंतर | ज्योतिषी | वैमानिक |
| स्वरूप | जो भवनों में निवास करते हैं | जिनका नाम प्रकार के देशों में निवास है | जो ज्योतिर्मय विमानों में निवास करते हैं | जो विमानों में निवास करते हैं |
| भेद | 10 | 8 | 5 | 12 (कल्पोपपन्न तक) |
| भेदों के नाम | 10 | 11 | 12 | 17 |
| प्रत्येक के सामान्य भेद (इन्द्र, सामानिक आदि) | 10 | 8 (त्राययस्त्रिंश व लोकपाल को छोड़कर शेष सभी) | 8 (त्राययस्त्रिंश व लोकपाल को छोड़कर शेष सभी) | 10 |
चार निकाय के देवों का निवास
| नाम | भवनवासी | व्यंतर | ज्योतिषी | वैमानिक |
| लोक | अधोलोक मध्यलोक | अधोलोक मध्यलोक | मध्यलोक | ऊर्ध्व लोक |
| निवास स्थान | अधोलोक -असुरकुमार -रत्नप्रभा पृथ्वी के पंचम भाग में -शेष 9 प्रकार – रत्नप्रभा पृथ्वी के खरभाग में ______ मध्यलोक -असुर कुमार भवनों में -शेष 9 प्रकार- भवन, भवनपुर और आवासों में | अधोलोक * राक्षस – रत्नप्रभा पृथ्वी के पंक भाग में * शेष 7 प्रकार – रत्नप्रभा पृथ्वी के खरभाग में ______ मध्यलोक -भवन भवनपुर और आवास -चित्रा पृथ्वी पर – द्वीप, पर्वत, समुद्र, देश, ग्राम, नगर, गृहों के ऑंगन, रास्ता, गली, बाग, वन आदि में | -चित्रा पृथ्वी से 790 योजन ऊपर से 900 योजन तक रहते हैं -तिर्यक रूप से घनोदधि वातवलय तक है | -सौधर्म स्वर्ग के प्रथम पटल के विमान से प्रारम्भ कर सर्वार्थसिद्ध विमान तक |
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान:देवगति नाम कर्म की उत्तर प्रकृति ज्योतिष्क नाम कर्म के उदय से ज्योति (कान्ति) का आश्रय होने से ये देव ज्योतिष्क कहलाते हैं। इस प्रकार उन देवों की ज्योतिष्क यह सामान्य रूप से संज्ञा होती है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
उत्तर: ग्रह आदि के भी अयुक्त क्रम जानना चाहिए अर्थात ग्रह शब्द अल्प स्वर वाला और अभ्यऱ्हीत (पूज्य) है इसलिए उसका नक्षत्र और तारका शब्द के पहले ग्रहण किया है। इसी प्रकार तारका से ग्रह-नक्षत्र अल्पाच और पूज्य है इसलिए तारका से पूर्व नक्षत्र को ग्रहण किया है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on – 12 February 2026.
Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project
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