
Acharya Shri Umaswati
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Sutra
आर्या म्लेच्छाश्च ॥३६॥
Meaning
आर्य और म्लेच्छ के भेद से मनुष्य दो प्रकार के हैं॥३६॥

भावार्थ
मनुष्य के दो भेद हैं- आर्य और म्लेच्छ । आर्य- जो अनेक गुणों से सम्पन्न होता है तथा गुणी पुरुष जिसकी सेवा करते हैं उसे आर्य कहते हैं। म्लेच्छ – जो आचार विचार से भ्रष्ट होता है तथा जिसे कर्म का कुछ विवेक नहीं होता उसे म्लेच्छ कहते हैं। आर्यों के मुख्य दो भेद हैं – ऋद्धि प्राप्त आर्य और ऋद्धि रहित आर्य | जिनके तप आदि से बुद्धि आदिक ऋद्धियाँ उत्पन्न हो जाती हैं वे ऋद्धि प्राप्त आर्य हैं। ऋद्धि रहित आर्य निमित्त भेद से पाँच प्रकार के बतलाये हैं क्षेत्रार्य, जात्यार्य, चारित्रार्य, कर्मार्य और दर्शनार्य । म्लेच्छ मुख्यता धर्म-कर्म व्यवस्था से रहित होते हैं, इसी से ये म्लेच्छ कहलाते हैं। ये अन्तर्द्धपज और कर्मभूमिज – इस प्रकार दो तरह के होते हैं। लवणसमुद्र और कालोदसमुद्र के मध्य में स्थित अन्तद्वीपों में निवास करने वाले कुभोगभूमिज मनुष्य अन्तद्वपज म्लेच्छ हैं तथा कर्मभूमि में पैदा हुए आर्यसंस्कृति से हीन मनुष्य कर्मभूमिज म्लेच्छ हैं। Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
English Meaning:
Human beings are of two kinds: the civilized (ārya) and the unevolved (mleccha ). Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain

Questions and Answers: शङ्का -समाधान
Answer इक्ष्वाकुवंश, हरिवंश, उग्रवंश, कुरुवंशआदि अग्रगण्य कुलों में उत्पन्न हुए राजा आदि, उनके मंत्री, पुरोहित, सेनापति, दण्डनायकादि सब ही आर्य थे। क्योंकि इन्हें सत् धर्म अत्यंत प्रिय है। फलतः इनका आचरण भी अनार्यों के असंयममय चारित्र से सर्वथा विपरीत (संयत ) होता है।
Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
Answer जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में जीवों के अभयदाता, धैर्ययुक्त आर्यों की निवासभूमि को आर्य खण्ड कहते हैं। इसी में विदेह देश है। यहाँ अनेक मुनियों ने तपस्या करके विदेह अवस्था प्राप्त की है। इसे आर्यक्षेत्र भी कहते हैं। यह तीर्थंकरों की जन्म और विहार की स्थली है।
Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
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Diksha Jain created this page on 9-feb-2026
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