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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
तद्विभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन्निषधनीलरुक्मि-शिखरिणो वर्षधरपर्वताः ।।११।।
Meaning
 उन क्षेत्रों को विभाजित करने वाले और पूर्व – पश्चिम लम्बे ऐसे हिमवान, महाहिमवान, निषध, नील, रुक्मी और शिखरी – ये छह वर्षधर पर्वत हैं

भावार्थ

भरत और हैमवत क्षेत्र के बीच में हिमवान् पर्वत है जो सौ योजन ऊँचा है। हैमवत और हरिवर्ष के बीच में महाहिमवान् है जो दो सौ योजन ऊँचा है। हरि वर्ष और विदेह के बीच में निषध पर्वत है जो चार सौ योजन ऊँचा है । विदेह और रम्यक क्षेत्र के बीच में नील पर्वत है जो चार सौ योजन ऊँचा है। रम्यक और हैरण्यवत के बीच में रुक्मि है जो दो सौ योजन ऊँचा है । और हैरण्यवत तथा ऐरावत के बीच में शिखरी पर्वत है जो सौ योजन ऊँचा है। ये सभी पर्वत पूरब समुद्र से लेकर पश्चिम समुद्र तक लंबे हैं ॥ ११ ॥ Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

The six mountain chains Himavān, Mahāhimavān, Niṣadha, Nīla, Rukmī, and Śikharī, running from east to west, divide these regions. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain



Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer यह हिमवन पर्वत भरत और हैमवत क्षेत्र की सीमा में स्थित है। इसे क्षुद्र हिमवन भी कहते हैं क्योंकि महाहिमवन पर्वत की अपेक्षा यह लघु है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji

Answer हिमवन पर्वत पृथ्वी के नीचे पच्चीस योजन गहरा तथा सौ योजन ऊँचा है। इसका विष्कम्भ (चौड़ाई) एक हजार बावन तथा एक योजन के उन्नीस भागों में से बारह भाग प्रमाण है। इस क्षुद्र हिमवन पर्वत की उत्तर जीवा चौबीस हजार नौ सौ बत्तीस योजन और एक योजन के उन्नीस भागों में से कुछ कम एक भाग प्रमाण है । इसकी पार्श्वभुजा का प्रमाण पाँच हजार तीन सौ पचास योजन और एक योजन के उन्नीस भागों में से साढ़े पन्द्रह भाग अधिक है । इस पर्वत का धनुःपृष्ठ उत्तर भाग में पच्चीस हजार दो सौ तीस योजन और एक योजन के उन्नीस भागों में से चार भाग से कुछ अधिक है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 5-feb-2026

Courtesy:
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