
Acharya Shri Umaswati
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सचित्तशीतसंवृता: सेतरा मिश्राश्चैकशस्तद्योनयः ।।३२।।
सूत्रार्थ- सचित्त, शीत और संवृत्त तथा इनकी प्रतिपक्षभूत अचित्त, उष्ण और विवृत तथा मिश्र अर्थात् सचित्ताचित्त, शीतोष्ण और संतप्तविवृत- ये उसकी अर्थात् जन्म की योनियाँ हैं ।।३२।।

भावार्थ
अर्थ- सचित्त, शीत और संवृत्त, इनके उल्टे अचित्त, उष्ण, विवृत, और इन तीनों का मेल अर्थात् सचित्ताचित्त, शीतोष्ण, संवृत्त विवृत, ये योनि के नौ भेद होते हैं। जीवों के उत्पन्न होने के स्थान विशेष को योनि कहते हैं। जो योनि चेतना सहित हो उसे सचित्त योनि कहते हैं, अचेतन हो तो अचित्त कहते हैं और दोनों रूप हो तो सचित्ताचित्त कहते हैं। शीत स्पर्श रूप हो तो शीतयोनि कहते हैं, उष्ण स्पर्श रूप हो तो उष्ण योनि कहते हैं, और दोनों रूप हो तो शीतोष्ण योनि कहते हैं। योनि स्थान ढँका हुआ हो, स्पष्ट दिखाई न देता हो तो उसे संवृत्त योनि कहते हैं। स्पष्ट दिखाई देता हो तो उसे विवृत योनि कहते हैं और कुछ ढंका हुआ तथा कुछ खुला हुआ हो तो उसे संवृत्त-विवृत योनि कहते हैं। योनि और जन्म में आधार और आधेय के भेद है। योनि आधार है और जन्म आधेय है; क्योंकि सचित्त आदि योनियों में जीव सम्मूर्छन आदि जन्म लेकर उत्पन्न होता है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
English Meaning:
With-life (sacitta), cold (śīta), covered (samvrta), their opposites – without-life (acitta), hot (usna), exposed (vivrta) – and their combination – with-and-without-life (sacittācitta), cold-and-hot (śītosna), covered-and-exposed (samvrta-vivrta) – are the seats-of-birth (yoni).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain

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योनि
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background: '#ffffff'
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flowchart TB
A["योनि<br>(उत्पत्ति स्थान)"] --> B["सचित<br>(चेतना सहित)"] & C["अचित<br>(चेतना रहित)"] & D["सचिताचित<br>(मिश्र)"] & E["शीत<br>(ठंडी)"] & F["उष्ण<br>(गर्म)"] & G["शीतोष्ण<br>(मिश्र)"] & H["संतप्त<br>(ढकी)"] & I["विवृत<br>(खुली)"] & J["संतप्तविवृत<br>(कुछ ढकी,<br>कुछ खुली)"]
A --- K["प्रत्येक जीव के ऊपर तीनों में से<br>
हर समूह में से एक,<br>
अर्थात् कुल मिलाकर 3 योनि<br>
नियम से होती हैं।"]
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style K fill:#BBDEFB| जीव | योनि | ||
|---|---|---|---|
| देव व नारकी | अचित | शीत व उष्ण | संतप्त |
| गर्भज-मनुष्य व तिर्यंच | सचिताचित | संतप्तविवृत | |
|
सम्मूर्छन मनुष्य व पंचेन्द्रिय तिर्यंच |
तीनों प्रकार | विवृत | |
| विकलेन्द्रिय |
दो प्रकार (अचित व मिश्र) |
||
|
एकेन्द्रिय (पृथ्वी, वायु, प्रत्येक वनस्पति) |
उष्ण | संतप्त | |
| अग्नि | उष्ण | संतप्त | |
| जल | शीत | संतप्त | |
| साधारण वनस्पति | सचित | तीनों प्रकार | |
|
– तिर्यंच * एकेन्द्रिय नित्य निगोद, इतर निगोद, पृथ्वी, जल अग्नि, वायु (प्रत्येक की 7-7 लाख) प्रत्येक वनस्पति * विकलेन्द्रिय द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरीन्द्रिय (प्रत्येक की 2 लाख) * पंचेन्द्रिय तिर्यंच |
6 × 7 3 × 2 |
42 लाख 10 लाख 6 लाख 4 लाख |
| – नारकी | 4 लाख | |
| – देव | 4 लाख | |
| – मनुष्य | 14 लाख | |
| कुल योनि | 84 लाख |
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: ‘युयते यस्यां इति योनि:’ भवपरिणत आत्मा जिसमें मिश्रण अवस्था को प्राप्त होता है या मिलता है उस भव के आधार को योनि कहते हैं। शरीर ग्रहण करने योग्य देश को योनि कहते हैं। उपपाद प्रदेश प्रचय रूप योनि है। जिसमें जीव आकर उत्पन्न हो वह योनि है। जिसमें जीव औदारिकादि नोकर्म वर्गणा रूप पुद्गलों के साथ सम्बन्ध को प्राप्त होता है ऐसे जीव के उत्पत्ति स्थान को योनि कहते हैं।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
उत्तर: योनियाँ दो प्रकार की होती हैं- (१) गुण योनि (२) आकृति योनि। योनियाँ नौ होती हैं – सचित्त योनि, शीत योनि, संवृत्त योनि, अचित्त योनि, उष्ण योनि, विवृत योनि, सचित्ताचित योनि, शीतोष्ण योनि और संवृत्त-विवृत योनि। योनि के चौरासी लाख भेद हैं- नित्य निगोद सात लाख, इतर निगोद सात लाख, पृथिवीकायिक सात लाख, अप्कायिक सात लाख, तेजोकायिक सात लाख, वायुकायिक सात लाख, वनस्पति कायिक दस लाख, द्वीन्द्रिय दो लाख, त्रीन्द्रिय दो लाख, चतुरीन्द्रिय दो लाख, पंचेन्द्रिय तिर्यंच चार लाख, देवों की चार लाख, नारकियों की चार लाख और मनुष्यों की चौदह लाख योनियाँ हैं।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
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- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on – 6 February 2026.
Courtesy:
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