
Acharya Shri Umaswati
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सम्मूर्छनगर्भौपपादा जन्म ।।३१।।
सूत्रार्थ- सम्मूचर्छन, गर्भ और उपपाद- ये (तीन) जन्म हैं ।।३१।।

भावार्थ
अर्थ- जन्म तीन प्रकार का है- सम्मूर्छन जन्म, गर्भ जन्म और उपपाद जन्म। तीनों लोकों में सर्वत्र बिना माता-पिता के संबंध के सब ओर से पुद्गलों को ग्रहण करके जो शरीर की रचना हो जाती है उसे सम्मूर्छन जन्म कहते हैं। स्त्री के उदर में माता-पिता के रज-वीर्य के मिलने से जो शरीर की रचना होती है उसे गर्भ जन्म कहते हैं। और जहाँ जाते ही एक अन्तरमुहूर्त में पूर्ण शरीर बन जाता है ऐसे देव और नारकियों के जन्म को उपपाद जन्म कहते हैं। इस तरह संसारी जीवों के तीन प्रकार के जन्म हुआ करते हैं ।।३१।।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
English Meaning:
Birth is by spontaneous generation – sammūrcchana, from the uterus – garbha, or in the special bed -upapāda.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: पूर्व भव समाप्त होने पर संसारी जीव नया भव धारण करते हैं, इसलिए उन्हें जन्म लेना पड़ता है। पूर्व भव का स्थूल शरीर छोड़ने के बाद अन्तराल गति से सिर्फ कार्मण शरीर के साथ आकर नवीन भव-योग्य स्थूल शरीर के लिए पहले-पहल (सर्व प्रथम) योग्य पुद्गलों को ग्रहण करना जन्म है। केवल शुभ कर्म, केवल अशुभ कर्म, माया और शुभाशुभ मिश्र कर्म, इनके द्वारा क्रमशः देव, नारक, तिर्यंच और मनुष्यों में जो उत्पत्ति होती है उसका नाम जन्म है। देव आदिकों के शरीर की निर्वृत्ति को जन्म कहा जाता है। बाह्य-अभ्यन्तर दोनों निमित्तों से आत्मलाभ करना जन्म है, जैसे मनुष्यगति आदि के उदय से जीव मनुष्य पर्याय रूप से उत्पन्न होता है। प्राणों को ग्रहण करना जन्म है।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
उत्तर: जन्म तीन प्रकार का होता है- (१) सम्मूर्छन (२) गर्भ (३) उपपाद।
Reference: Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
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Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on – 6 February 2026.
Courtesy:
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